श्रीराम ताम्रकर : स्वर्णिम युग का अंत


स्मृति आदित्य| पुनः संशोधित रविवार, 14 दिसंबर 2014 (12:06 IST)
सर नहीं रहे लिखते हुए ना सिर्फ लेखनी बल्कि मैं पूरी कांप रही हूं। लग रहा है जैसे सघन छांव का वटवृक्ष भरभरा कर गिर गया है और मैं और मुझ जैसे कितने ही उनके स्नेहभाजन चिलचिलाती धूप में एकाकी खड़े रह गए हैं। तपते-जलते रेगिस्तान में अब सिर्फ शब्दों का भंवर है और हर शब्द थपेड़े की तरह पड़ रहा है। मैं स्तब्ध हूं, मौन हूं लेकिन भीतर ही भीतर मैं सुन रही हूं अपना ही विलाप.. एक चित्कार... एक दहाड़.... और सिर्फ मैं नहीं मेरे जैसी उनकी जितनी भी बेटियां हैं उन सबकी यही हालत है.. लगातार बजते फोन पर सब मुझसे सुनना चाह रही है कि यह खबर झूठ है... मैं भी यही चाहती हूं कि कोई कह दे कि यह खबर झूठ है। 
 
 
जिस दिन से सर से पहली मुलाकात हुई उस दिन से लेकर उनके जाने तक उनसे आत्मीय संपर्क में रही.. उनका सान्निध्य मेरे लिए ईश्वर का विशेष आशीर्वाद रहा है। ताउम्र मैं ईश्वर को इस बात के लिए धन्यवाद दे सकती हूं कि उस पवित्र आत्मा के दिल में मुझे बेटी का दर्जा मिल सका...
 
मुझे याद है, पत्रकारिता अध्ययनशाला में अतिथि व्याख्याता के रूप में मेरा पहला दिन था। सर क्लास लेकर आए तो विभागाध्यक्ष परमार जी ने मेरा परिचय करवाया। मैं अभिभू‍त सी उन्हें देखती रह गई, उन्हें नईदुनिया में इतना पढ़ा था कि सहज ही मेरे हाथ उनके चरणों पर झुक गए। मैं कुछ बोलूं उससे पहले सर के वाक्य थे... . आप तो नईदुनिया में खूब लिखती हैं... मैंने कहा नहीं सर मुझे तो अभी आप जैसे गुणीजनों से बहुत कुछ सीखना है. .. उस वक्त या तो सरस्वती मेरी जिव्हा पर विराजमान थीं या सच्चे दिल से निकले मेरे बोलों का असर था कि सच में सर से मैंने उस दिन से लेकर हर दिन कुछ ना कुछ सीखा और आज यहां तक आ गई। 
 
यहां तक कि मेरी बेरोजगारी के दिनों में मेरे 'स्वाभिमान' को बनाए रखने की मेरी जिद को सिर्फ उनका 'स्नेह' मिला... और उन्होंने मुझसे इतना लिखवाया, इतना लिखवाया कि कभी लगा ही नहीं कि मैं बेकार हूं.... निरंतर मेरा नाम छपता रहे, मुझे किसी तरह कहीं से भी पैसा मिलता रहे, यही सर की कोशिश रही। 
 
8 अभिनेत्रियों पर 'फिल्म संस्कृति' के रूप में मोनोग्राफ हो या फिल्मी खबरों का अनुवाद। मुश्किल से मुश्किल काम वे सहजता से करवा लेते थे। उनका आदेश मेरे लिए हमेशा किसी मंत्र की तरह होता था... । सर ने जो काम कहा है अपना हर काम छोड़कर बस वही काम करना है। 
 
पूना से फिल्म रसास्वाद पाठ्यक्रम की घर से अनुमति नहीं मिली तो वे खुद घर चले आए और माता-पिता को यह विश्वास दिलाया कि स्मृति मेरी जिम्मेदारी है आप चिंता न करें। 
 
जब मैं पूना में थीं तब यहां मेरे कुछ आलेख प्रकाशित हुए तब सर ने अपने अत्यंत खूबसूरत अक्षरों के साथ मुझे एक आत्मीय पत्र लिखा और बड़े ही व्यवस्थित रूप में साथ में मेरे आलेखों की कटिंग लगाई... कितने लोग अपनी बेटियों के लिए ऐसा कर पाते हैं जो सर ने मुझ जैसी 'मानस पुत्रियों' के लिए किया...
 
शब्द हो या मात्रा, वाक्य हो या पूरा लेख. . हर सूक्ष्म बात उनकी नजर से गुजर कर ही कुंदन बन सकी। लेखन को सरल, सहज, सुंदर, संक्षिप्त और सटीक लेकिन रोचक बनाने की उनकी कला की मैं कायल थीं। उनके हाथ की बनी अखबार की डमी इतनी खूबसूरत और सुव्यवस्थित होती थी कि कोई नौसिखिया भी उसे देखकर अखबार बना सकता था। 
 
जब से उनका सान्निध्य मिला मुझे नहीं याद कि कभी कोई दिवाली या नया वर्ष उनके उपहार के बिना गया हो... इस बार दिवाली पर वे बीमार थे तो समय सर(उनके बेटे) और मेघना भाभी के हाथों आशीर्वाद भिजवाया। 
 
उनके कितने रूप थे। वे स्नेह और सकारात्मक ऊर्जा से भरी ऐसी दिव्य शख्सियत थे कि उनके पास बैठने मात्र से सारी चिंताएं दूर हो जाती थी...मैंने अपने हर कष्ट के पलों में उनका हाथ अपने सिर पर पाया। उनकी मीठी आवाज सुनकर तो उन्हें परेशानी बताने का मन ही नहीं होता था। पर वे समझ जाते, '' क्या हुआ बेटा... कोई परेशानी है? आ जाओ शाम को, तुम्हारे लिए कुछ रखा है  मैंने।'' 
 
और वे बिना मेरी परेशानी सुने जान जाते कि मुझे क्या हुआ है। मुझे मेरी परेशानी का हल अक्सर वहीं मिला है उनके निवास स्थान- 2, संवाद नगर में। मैं फिर कहती हूं कि ना सिर्फ मैं बल्कि जाने कितनी उनकी मानस पुत्रियां आज अनाथ हो गई। उन जैसा विराट व्यक्तित्व जाने के लिए नहीं होता है। मस्तिष्क की अरबों बारीक कोशिकाओं में अपने विलक्षण प्यार के साथ हमेशा जिंदा होता है। फिल्म जैसी ग्लैमर की दुनिया पर इतनी सात्विकता के साथ पत्रकारिता निभाने वाले ताम्रकर सर जैसे लोग एक युग बनकर आते हैं और जाते हुए पूरा युग अपने साथ ले जाते हैं। रूपहले पर्दे के लिए सुनहरे युग को अपनी लेखनी से रचने वाले का श्रीराम ताम्रकर जी का जाना अत्यंत असहनीय है। अश्रु पूरित बिदा.... सश्रद्ध नमन... 
 

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