पर्यटन, रोजगार एवं वैश्विक संबंधों की आधारशिला है...


मानव मन सदा से प्रकृति का साथ चाहता है इसीलिए तमाम व्यस्तताओं से बचकर वह जा पहुंचता उस छांव में, जहां वह खुद को पुनर्नवा कर सकता है। इस प्रक्रिया में वह कभी नदियों को जीता है, कभी पर्वतों को लांघता है तो कभी मरुस्थलों को टोहता है।  
 
 
 
भारतीय परंपरा में परिव्राजक का स्थान प्राचीनकाल से ही है। संन्यासी को किसी स्थान विशेष से मोह न हो इसलिए परिव्राजक के रूप में करते रहना होता है। ज्ञान के विस्तार के लिए अनेक यात्राएं की जाती थीं। 
 
आदिशंकर और की प्रसिद्ध भारत यात्राएं इसी उद्देश्य से हुईं। के आगमन पर के संदेश को अन्य देशों में पहुंचाने के लिए अनेक भिक्षुओं ने लंबी यात्राएं कीं। 
 
अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को इसी उद्देश्य से श्रीलंका भेजा। सामान्यजन के लिए ज्ञान के विस्तार और सामूहिक विकास के लिए तीर्थयात्राओं की व्यवस्था भी प्राचीन भू-पर्यटन का ही एक रूप था।  
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जिस तरह शब्दों का आलोपन, विलोपन चेतना को झंकृत करता है उसी तरह ऋतुओं का नर्तन और ऐतिहासिक स्थापत्य मन को वीतरागी, तो कभी मयूर कर देता है। पर्यटन खुद से पुन: पुन: जुड़ने का अवसर तो है ही, साथ ही सांस्कृतिक धरोहर और विरासत से जुड़ने का मौका भी।
 
 
 

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