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जानिए, भारत विभाजन के 10 बड़े कारण

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नेहरू और पटेल का एकाधिकारवादी मनोवृत्ति-

राजनीतिक नेता के तौर पर नेहरू की पहली असली परीक्षा की घड़ी 1937 के चुनावों के समय आई। अब वह गांधी के सहायक नहीं थे, जो 1934 के बाद नेपथ्य में चले गए थे। चुनावों में कांग्रेस की जीत और उसकी प्रथम क्षेत्रीय सरकारों के गठन के साल में वह कांग्रेस के अध्यक्ष थे।

चुनाव परिणामों को लेकर शेखी बघारते हुए नेहरू ने घोषणा की कि भारत में महत्व रखने वाली अब दो ही शक्तियां हैं: कांग्रेस और अंग्रेज सरकार। इसमें जरा भी शक नहीं कि खुद को धोखा देने वाले घातक अंदाज में उन्हें इस बात पर भरोसा भी था। दरअसल यह एक इकबालिया जीत थी।

कांग्रेस का सदस्यत्व 97 फीसदी हिंदू था। भारत भर के लगभग 90 फीसदी मुसलमान संसदीय क्षेत्रों में उसे खड़े होने के लिए मुसलमान उम्मीदवार तक नहीं मिले। कांग्रेस ने सभी हिंदू सीटें जीत ली थीं। मगर एक भी मुस्लिम सीट वह हासिल नहीं पर पाई थी। कांग्रेस और मुस्लिम लीग में ताल्लुकात खराब नहीं थे लेकिन जब मुस्लिम लीग का कांग्रेस के गठजोड़ की बात उठी तो नेहरू ने बड़ी रुखाई से विलय की बात रखी।

इस जीत से नेहरू के भीतर एकाधिकारवादी मनोवृत्ति का जन्म हो चुका था। और वे दूसरों के सपने को छोड़ अपने सपनों का भारत बनाने की सोचते लगे थे। इसी के चलते नेहरू का महात्मा गांधी से ही नहीं मोहम्मद अली जिन्नाह, सरदार पटेल और बाबा आम्बेडकर से भी कई मामलों में मतभेद था।

एक समय ऐसा आया जबकि आम्बेडकर ने नेहरू को एकाधिकारवादी बताया था।

कांग्रेस के नेताओं की बढ़ती उम्र और राजनीतिक खालीपन...



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