कान फिल्म फेस्टिवल : बस, पर्दा उठने की देर है...


से प्रज्ञा मिश्रा की रिपोर्ट ....

पिछले 70 सालों में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म जगत से जुड़ा हर नाम मई महीने में फ्रांस के दक्षिण इलाके में कैन (कान ) शहर में होना चाहता है, कुछ की यह हसरत पूरी हो जाती है और कुछ अगली मई का प्लान बनाते रहते हैं। आलम यह है कि लंदन से आने वाली हर फ्लाइट पूरी तरह से पैक है, चाहे कोई भी एयरलाइन हो या कोई भी एयरपोर्ट, हर फ्लाइट खचाखच भरी हुई है। अगर मुंह उठा के निकल पड़ने की आदत हो तो उस दिन कैन तो नहीं ही पहुंचेंगे यह तय है।

मेलबोर्न से निकली लुसिंडा लगभग चवालीस घंटे की कवायद के बाद कैन पहुंच पाई और ऐसी वह इकलौती नहीं है, न जाने कितने लोग हैं जो उनींदी आंखों और थके बदन के साथ बस या ट्रैन से इस शहर पहुंच रहे हैं।

तो आखिर ऐसा क्या है जो इस फिल्म फेस्टिवल को दुनिया का सबसे बड़ा नामचीन फेस्टिवल बनाता है। यह फेस्टिवल फिल्म का ऐसा बाजार है जहां हर नाम अपनी चीज़ बेचना चाहता है, क्योंकि न सिर्फ यहां वह खरीदार की नज़र है, बल्कि उनके सामान के कद्रदान भी हैं। फिल्म वाले अपनी फिल्म के साथ कैन (कान) का नाम जोड़ना चाहते हैं क्योंकि भले ही फिल्म मार्केट में पैसा देकर दिखाई गई हो लेकिन उसका वजन बढ़ जाता है, और यही वजह है कि इस साल सिवाय एक शॉर्ट फिल्म के, भारत का कोई नाम लेवा नहीं है लेकिन फिर भी मार्केट में भारतीय फिल्मकारों की फिल्में अच्छी खासी तादाद में हैं।

इस साल फिल्म फेस्टिवल में कॉम्पिटीशन फिल्मों की जूरी में विल स्मिथ (मेन इन ब्लैक, इन परसूट ऑफ़ हैप्पीनेस) शामिल हैं और उनकी वजह से पर भीड़ बढ़ने के पूरे आसार हैं, वैसे तो जूरी प्रेजिडेंट पेड्रो अल्मोडोवार हैं जो स्पेनिश फिल्म डायरेक्टर हैं, लेकिन आम जनता और टूरिस्ट तो विल स्मिथ के लिए अभी से पलकें बिछाए बैठे हैं। .और हो भी क्यों न, आखिर विल स्मिथ को हॉलीवुड का सबसे पावरफुल एक्टर कहा जाता है।

17 मई को ओपनिंग फिल्म 'इस्माइल्स घोस्ट' से फेस्टिवल की शुरुआत है।
बस अब तो पर्दा उठने की देर है...



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