लघुकथा : अनुत्तरित प्रश्न



मुख्य मार्ग पर काफी भीड़ जमा थी। शायद कोई दुर्घटना हो गई थी। सामने से इस ओर ही आ रही कार में बैठे पिता-पुत्री ने यह दृश्य देखा।
पुत्री बोली-"चलिए पिताजी! देखें,क्या हुआ है?शायद हम कुछ मदद कर सकें।"

पिताजी ने पुत्री को घूरा और यह कहते हुए कार का रुख बदल लिया, "हमें नहीं पड़ना इन पचड़ों में। हम बिजनेसमैन हैं और बिजनेस में प्रत्येक क्षण अत्यंत मूल्यवान होता है।"

पुत्री ने मानवीयता का तर्क दिया किन्तु पिताजी उपेक्षा से कंधे उचकाते हुए बोले-"क्या हमने ही दूसरों की मदद करने का ठेका लिया है?और भी बहुत हैं मदद करने वाले।"
उष्ण रक्त की धार उनकी कार के पहिये को छूती हुई चली गई और पुत्री आह भरकर रह गई।

अगले दिन के अख़बार में मृतक की तस्वीर प्रकाशित हुई,जिसे देखकर पिताजी गश खाकर गिर पड़े।

मालूम हुआ कि वह उनका इकलौता पुत्र था,जो दूसरे शहर से बिजनेस की डिग्री लेकर घर लौट रहा था।

और यह भी कि 'और भी बहुत' में से किसी ने भी पुलिस या समय का बहाना लेकर उसकी मदद नहीं की अन्यथा उसे बचाया जा सकता था।
आज मानवीयता,स्वार्थ से हार गई थी। क्या यह ठीक हुआ?
प्रश्न अनुत्तरित है और संभवतः अनुत्तरित ही रहेगा।

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