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सुनो....कि अब लब आजाद हैं मेरे....


सुनो, अब मैं बोल सकती हूं। शरीर से जान निकलते ही मेरी जुबां में जाने कहां से ताकत आ गई। बिलकुल वैसी ही ताकत जैसी चौराहों पर मेरे लिए इंसाफ मांगनेवाली आवाजों में है। वैसी ही जैसी गर्मजोशी मेरे हत्यारों को सजा दिलवाने के नारों में है। वैसी ही जैसी आप सब सुन रहे हैं।


क्या सब लड़कियों की जुबां में ताकत मरने के बाद ही .....? अब मैं बोल सकती हूं, बताती हूं मेरी कहानी.....

1.मैंने जाति नहीं चुनी

उस दिन कुछ अनजान लोग जबरन उठाकर ले जा रहे थे मुझे। दुबली-पतली मैं और हट्टे-कट्टे वो। जमीन पर गिरे रूमाल की की तरह उठाया और मोड़कर दबा लिया कांख में। चिल्ला भी न सकी और मुंह दबा दिया। वे आपस में बार-बार एक ही बात कहते थे। ‘इनकी जाति का तो नामों निशां नहीं रहने देंगे। देखते हैं,ये खानाबदोश कैसे मुंह उठाकर जीते हैं इस गांव में। थर-थर कांपेंगे इस ओर आने में।‘

कांख में दबी मैं सोचती रही। हमारी जाति, धर्म से क्या बैर है इन्हें? मैं जिस परिवार में पैदा हुई उसकी जाति मैंने तो नहीं चुनी? कोई अपनी मर्जी से जाति चुनता है भला? उस जाति में पैदा होने में मेरा क्या गुनाह है? क्या किसी और जाति में पैदा होती तो ये लोग मुझे नहीं उठाते? क्यों... मैं ही क्यों?

2.डर लग रहा था कसम से

वे कितने बड़े और कितने भारी थे। जोर से बोलते तो मेरी आवाज ही बंद हो जाती। लग रहा था, देखा है इन्हें। गांव में ही, आसपास। एक ने मेरे पैर पर पैर रखा तो लगा किसी चट्टान के नीचे दब गया है मेरा पैर। किसी मंदिर के अंदर जोर से नीचे पटक दिया मुझे। ओह! कितना डर लग रहा था मुझे उस छोटे से, अंधेरे कमरे में।

अंधेरा, भूख, प्यास, डर इतना सब एक साथ तो कभी सहन नहीं किया था मैंने। कसम से। ऐसा क्या गुनाह हो गया था जिसकी मुझे सजा मिल रही थी?

3.काश ! कोई आ जाए

वो हंसते, जोर से बातें करते, गालियां देते और फिर मेरे पैरों के बीच में तो ....... आह ! मुंह दबा दिया, हाथों को नोंच दिया। किसे पुकारूं? घर में किसी को मेरी याद नहीं आ रही क्या? कोई ढूंढता हुआ, पुकारता हुआ यहां क्यों नहीं आ रहा? मुंह दबा देते हैं मेरा। चीख तो दूर आवाज भी नहीं निकल पा रही थी।

कपूर की खुशबू से ऐसा लगा मंदिर है कोई। फिर तो यहां भगवान भी होंगे। वही जिनको सब पुजते हैं। जो दुष्टों से रक्षा करते हैं। पापी को दंड देते हैं। जिनसे सब मुरादें मांगते हैं। तो फिर वो कहां हैं? यहां ये लोग कैसे मेरे साथ...? क्या उन्हें भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा? मैं कितनी तकलीफ में हूं। ये दुष्ट राक्षस नोंच रहे हैं, गालियां दे रहे हैं, मार रहे हैं, दर्द से मरी जा रही हूं मैं।

आंखें बंदकर, भीतर का दर्द सहते हुए मैंने भी मुराद मांगी। भगवान, कोई आ जाए और छुड़ा ले जाए मुझे इन दरिंदों से, पापियों से, गंदी हरकत करनेवालों से। पर नहीं, कोई नहीं आया। अब मेरी सहेली सोना मिलेगी तो कह दूंगी, तू झूठ कहती है.....मूर्ति में कोई नहीं होता। भगवान भी नहीं।

4.भरोसा नहीं करना
बहुत दर्द था, डर था, चिंता थी पर भूख भी लग रही थी, बहुत जोरों से। उन्होंने कुछ गोली दी, शरबत सा दिया पीने को। सोचा, राहत मिलेगी इन चार बूंदों से। पर कहां? उसमें तो कुछ नशा सा था। सिर चकराया और बस। भूख, दर्द सब गायब।

कुछ लोग होते हैं न जिन पर हम भरोसा करते हैं। मैं भी करती थी। मंदिर के पंडित जी, पुलिसवाले भैया पर। सबने धोखा दिया। मेरे साथ गंदा काम करनेवाले वही थे। जो सबको सही करते हैं, उन्हीं ने गलत काम किया। किसी पर भरोसा नहीं करना, सच कहती हूं, अपने अलावा किसी पर भी नहीं। यह दुनिया भरोसे के लायक नहीं है।

5.सब सुन्न हो गया -

पता नहीं क्या था उस शरबत में। ऐसा नशा चढ़ा कि होश ही नहीं। बस, कभी हल्की सी आंख खुलती, दिखता कुछ नहीं। बस कानों में सुनाई देता..... वाह, मजा आ गया, लो भुगतो अपनी करनी, इनकी तो हर लड़की को ऐसी सजा मिलेगी, नामोनिशां मिटा देंगे इस कौम का... अब तू बस कर... मुझे कर लेने दे.... एक बार और..... भीतर तेज दर्द उठता..... टांगों से गीला सा शायद खून रिसता महसूस होता..... और मैं फिर बेहोश।

फिर तो कोई दर्द नहीं, बस उनके शरीर का भारी वजन महसूस होता जिस्म पर... चट्टान सा.... फिर बेहोशी।
जिस्म में जान थी, सुन्न पड़ते जिस्म में धड़कन थी।

6. अब दिन पूरे हुए मेरे

पता नहीं कितने दिन और रातें गुजर गए। न खेलने गई, न रोटी खाई। नहाई भी नहीं और चोटी..... बहुत बाल खींचे उन गंदे लोगों ने। एक-एक बाल दर्द करने लगा था। सांसों के अलावा कुछ और महसूस नहीं हो रहा था। पर होश था। इतना कि मैं नन्हीं सी जान समझ गई, इस धरती पर मेरी जिंदगानी के दिन पूरे हुए।

अब मैं कभी सहेलियों के साथ नहीं खेल पाऊंगी, कभी दौड़कर खाने की चीज लेने नहीं जा पाऊंगी, कभी पाठ नहीं पढूंगी और इबारत भी नहीं लिखूंगी। ना कोई गलती होने पर मुझे डांट पाएगा, ना अच्छा करने पर तारीफ मिलेगी। कोई नई ड्रेस नहीं खरीदी जाएगी मेरे लिए, ना खाने की चीजों के लिए लड़ाई होगी भाई-बहनों की। खिलौने मेरे तो रहे नहीं... कोई भी खेले.... । वो सितारेवाली गुड़िया जिसे मैं दुल्हन की तरह सजाती थी, वो बहुत रोयेगी मेरे लिए। उसे मेरे जितना कोई प्यार नहीं करेगा।

अभी मन नहीं भरा था दुनिया से। जरा सा तो जिया था मैंने जिंदगी को। कितने अरमान बाकी थे। और कितने सपने जो अनदेखे ही थे.... उनका क्या होगा ? बुलानेवाले, क्या किसी जाति विशेष में पैदा होना इतना बड़ा गुनाह है मेरा? जिंदगी दी थी तो जीने देता। सिर्फ आठ साल दिये और बुला भी लिया.... इतनी जल्दी ....? क्यों ....?

7. लानत है इन पर -

शायद मन भर गया होगा उन सब का। या सबब पूरा हो गया होगा। दुष्ट दरिंदों ने मार डाला मुझे। सिर पर पत्थर मारे, गला दबाया और चीख निकलने से पहले ही मेरी जान निकल गई। सच, मेरे उस समय जिस्म में जान नहीं थी। पर पता नहीं क्यों दिल की धड़कनें चल रही थीं, धीमे-धीमे। शायद, आखिरी उम्मीद हो जिंदगी की।

तभी पुलिसवाले की आवाज आई.... अभी नहीं मारना.. एक बार और करना है मुझे ! जिंदा होती तो रोंगटे खड़े हो गए होते मेरे। जरा सी सिहरन तक न हुई शरीर में। कुछ बचा ही न था।

पता नहीं कितनी जगह नोंचा, बाल खींचे, मारा, हर जगह से खून टपकता रहा, दर्द होता रहा। फिर सब गायब। न दर्द, न गीलेपन का एहसास।, न भूख का एहसास, न अपनों की याद। बहुत हल्की हो गई थी मैं, अचानक।


8. अब तो भीड़ है बड़ी -

जब मैं चाह रही थी कि कोई आए, मुझे बचा ले, तब तो कोई नहीं आया। एक पंछी भी नहीं। और अब देख रही हूं यहां से। पूरे देश के लोग आसिफा का नाम ले रहे हैं। जगह-जगह फोटो है मेरी। वो सुंदर सी फ्राक में नहीं, किसी खेत में सोई, खून से लथपथ।

सड़कों पर, चौराहों पर,टीवी, रेडियो, मोबाइल में हर तरफ मेरी चर्चा है। आसिफा की चर्चा है। जो मैं न हुई, कोई बड़ी हीरोइन हो, खूबसूरत। क्यों सब मेरा नाम ले रहे हैं ? इंसाफ दिलाने की बातें कर रहे हैं? उन दरिंदों को सजा दिलाने की बात कर रहे हैं?


सच में चाहते हैं कि अब कोई आसिफा, अंजना, आरती, अमरजीत, आलिया या कोई और आ.... ऐसी मौत न मरे तो..... तो ....... एक ही जाति रखो, इंसानियत। बाकी सारी जातियों, धर्मों, मजहबों को दफना दो। मेरे ही ताबूत में। आज, अभी।


सीमा व्यास

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