मदर्स डे पर लघुकथा : एक चुटकी प्यार

’ अच्छा ? कैसे ? बताओ तो जरा।’ मां ने रसोई से ही उत्साह में पूछा।

’ अभी ही। आप हलवा बना रही थीं और मैं दरवाजे पर खड़ा देख रहा था। ’

’ चल, ऐसे भी कहीं आता है हलवा बनाना ! अच्छा बता तो कैसे बनाया ?’

’ देखो, सबसे पहले आपने कढ़ाही में घी डाला। फिर उसमें सूजी डाली। है न ?’

’ बिलकुल ठीक।’

’ उसे धीमी आंच पर भूनती रहीं। बदामी रंग होने तक। सुगंध पूरे घर में महकने लगी थी..तब आपने गुनगुना पानी डाला। फिर डाली शकर । उसे अच्छी तरह से हिलाया और ऊपर से सूखे मेवे डाले। बस हलवा तैयार हो गया। सही बताया ना मैंने ?’
’ अरे वाह ! तुमने तो सच में मुझ जैसा हलवा बनाना सीख लिया। शाबास बेटा।’

’ पर मां, सबसे आखिरी में आपने ऐसे चुटकी घुमाते हुए क्या डाला था? मैं देख ही नहीं पाया।’

’ वो .... कुछ नहीं बेटा..... वो तो यूं ही .....स्वाद के लिए बस एक चुटकी प्यार था।’

’ ओह मां ! तो सारा स्वाद उसी चुटकी से आता है? मैं कहां लाऊंगा एक चुटकी मां का प्यार? मैंने गलत कहा। मैं आपके जैसा हलवा नहीं बना सकता मां। '

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