प्रेम कविता : जब पहनती हो तुम श्वेत रंग


स्मृति आदित्य

तुम पहना करो वह रंग
जो मुझे भर देते हैं खुशबू
से

जब पहनती हो तुम श्वेत रंग
मैं महक उठता हूं मोगरा, चमेली और चंपा की सुगंध से

जब होती हो तुम गुलाबी वसना
मेरे मन आंगन में बरसने लगते हैं सैकड़ों गुलाब

जब धारण करती हो तुम बादामी और नारंगी संयोजन का कोई परिधान
मेरे मानस की धरा पर झरने लगते हैं हरसिंगार

जब तुम चटख लाल रंग में
खिलखिलाती आती हो
बहार आ जाती है
मेरे मन की नाजुक बगिया में ...
जवा कुसुम की...

तुम कभी मत पहनना धुसर बदरंग कोई भी वस्त्र
जानती हो ना
मैं महकना चाहता हूं तुम्हारे रंग की खुशबू
से

तुम पहनना वह रंग
जो भर दे मुझे अव्यक्त सी अलौकिक सुगंध से...

गोया कि तुम्हारे पहने रंगों से
आता है फूलों का मौसम
मेरी दुनिया में....


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