राजनीति पर कविता : क्यों ? क्यों ? क्यों ?

chunav

सत्ता को पा जाने की ही चाह क्यों है ?
राजनीति अपने स्थापित आदर्शों से यों गुमराह क्यों है ?
सर्वशक्तिमान मतदाता इतना निरीह और बेबस क्यों हैं ?
में उछाले गए मुद्दे इतने बेहूदे और बेकस क्यों हैं ?

में सिद्धान्तहीन लोगों की निर्विघ्न चलती मनमानी क्यों है ?
राजनीति की राह सुयोग्य युवाओं के लिए अनजानी क्यों है ?

जनशक्ति अपनी सामर्थ्य से बिलकुल अनजान, ऊंघती, सोती क्यों है ?
राजनीति कुछ हठधर्मियों की बरबस बन गई बपौती क्यों है ?

गुजरात की चुनावी गहमा गहमी से ये ही सब संकेत मिले हैं।
क्या चिन्तनशील मनों को चिन्तित करने वाले नहीं ये सिलसिले हैं ?

एक परिपक्व प्रजातन्त्र में जाति, धर्म, जनेऊ, मंदिर ही क्या मौजूं चर्चा के विषय हैं ?
यह प्रजातन्त्र ऐसे ही चले क्या यही बस हम सबका निर्णय है ?


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