हिन्दी कविता : कविता खड़ी बाजार में...


साहित्यिक सब हो रहे, चबली-चोर-चकार।
जो जितना अकबक लिखे, उतना उत्तम रचनाकार।
 
वर्तमान में, शब्द हुए कमजोर।
भाव-प्रवणता मर गई, मचा हुआ है शोर।
 
कविता खड़ी बाजार में, लूट रहे कवि लोग।
कुछ श्रृंगारों पर लिखें, कुछ की कलम वियोग।
 
अश्लीलों को मिल रहा, भारत-भूषण सम्मान।
पोयट्री मैनेजमेंट कर रहा, सरस्वती अपमान।
 
सम्मानों की भीड़ में, खो गया रचनाकार।
साहित्य सुधि को छोड़कर, अहं चढ़ा आचार।
 

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