कविता : अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद


किसी भी क्रांतिकारी-बलिदानी ने स्वतंत्र राष्ट्र में अपने लिए या अपनी आगामी पीढ़ी के
लिए तख्त-ओ-ताज नहीं मांगा।
किंतु विगत सत्तर वर्षों से वो स्वर्ग में बैठे सोचते होंगे- 'आख़िर किनके लिए हमने अपने
प्राणों को बलिवेदी पर टांगा?'
हमें क्षमा करना वीर 'आजाद'
हमने देश को कर दिया बर्बाद
आज भी कर्तव्य-पथ पर हो रहे कई निसार
देश में थोड़े-बहुत हैं आज भी ईमानदार किरदार
पर सत्तर सालों से गहरी धंसी विकासशील की कील
पूर्ण विकसित हो जाता देश कभी का होते जो सभी सुशील
लेकिन करोड़ो-करोड़ रुपयों के होते रहे घोटाले
भ्रष्टाचार-प्रपंच पर 'भानु' कोई तो ताला डाले।

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