नई कविता : मुसाफिर



जीवन-यात्रा के हम
वे हैं
जो पाने को मंजिल अपनी
भटकते रहते हैं सदा।

सबके होते हैं लक्ष्य अलग
होती हैं सबकी
मंजिलें भी अलग-अलग।

कोई मान-सम्मान के लिए
तो कोई पद-प्रतिष्ठा और
धन-संपदा के लिए

बना रहता है मुसाफिर सदा
इस जीवन यात्रा में

मगर बहुतायत में
मिलते हैं ऐसे भी मुसाफिर
जिनके लिए

कोई लक्ष्य या कोई मंजिल
पा लेना तो दूर की बात
मुश्किल होता है
दो जून की रोटी भी जुटा पाना ।

भटकते तो रहते हैं वे भी
बनकर मुसाफिर
इस यात्रा में जिंदगी भर
मगर आत्म-सुकून लिए हुए ।

हर हाल में मुस्कुराते हुए
आत्म-संतोष के साथ।

बस, यही फर्क है
उनमें और हम में।

हम पाकर भी सबकुछ
खोते रहते हैं हर पल
सुकून अपना ।

बढ़ती ही जाती हैं हमारी
लालसाएं, कुत्सित भावनाएं
और झूठा दंभ
जबकि नहीं होता है उनमें
इतना कुछ।

अंतर्मन में रहकर भी बेचैन
ओढ़ लेते हैं हम यही
झूठा आवरण
दिखाने को अपनी शानो-शौकत

मगर दूसरी तरफ वे
रहकर इन सबसे दूर
सफर करते हैं बिंदास

बनकर मुसाफिर
अपनी जीवन-यात्रा में।

सीखना होगा ,
हम सबको भी
आत्म-संतोष का यह गुण उनसे

जीवन-यात्रा में अपनी
एक अच्छा मुसाफिर बनने के लिए
उनकी ही तरह

राह भी तभी
आसान होगी हमारी
सुकून भरी मंजिल के लिए ।

तो बनेंगे न हम
एक अच्छा मुसाफिर
जीवन में
सुकून पाने के लिए ?
सदा मुस्कुराने के लिए ?







देवेंन्द्र सोनी

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