कविता : भारतमाता का पुत्र

मैं प्रतापी,
सीमा की रक्षा करता हूं।
जो आके टकराता है,
अहं चूर भी करता हूं।
दुश्मन की कोई भी,
दाल न गलती।
लड़कर दूर भगाता हूं,
अपने भारत के वीर गीत को,
हर मौके पर गाता हूं।

आतंकवादी अवसरवादी,
आने से टकराते हैं।
आ गए मेरी भूमि में,
तहस-नहस हो जाते हैं।

अपने देश की माटी का,
माथे पर तिलक लगाता हूं।

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