कविता : ये लड़के और लड़कियां


देवेन्द्र सोनी
सज-धज कर दुपहिया पर
घर से निकलते हैं युवा होते लड़के
और मौसम चाहे कोई हो
छांव से भी झुलसती हैं लड़कियां
आंख तक मुंह पर दुपट्टा बांधे ही
घर से निकलती हैं लड़कियां ।
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देखा है मैंने -
स्कूल कॉलेज या कोचिंग
के समय
कांधे पर बैग लटकाए
किसी के पीछे बैठ
निर्जन राहों पर मस्ताते हुए इन्हें
उन्मादित लड़कों के साथ ।

आपत्ति नहीं है मुझे
किसी की निजता से
और न ही आपत्ति है
उनके स्वभावगत
अंधे आकर्षण से ।

जानता हूं
उम्र का स्वाभाविक सैलाब है यह ।

पर उन परिजनों के विश्वास का
क्या होगा भविष्य ?
जिन्होंने बांध रखे हैं
इन मुंह छुपाती लड़कियों
और इठलाते, इश्क फरमाते
लड़कों से, उम्मीदों के बांध !

इतर इसके गर्त में जाते
इन नासमझ लड़के-लड़कियों का
अक्सर होता है कितना बुरा हाल
देखा है इसे भी हम-सबने ।

मानता हूं -
रोकना मुश्किल है
गर्त के इस सैलाब को
पर करना ही होगा अब यह
उन्माद भरे से
बचाने के लिए उन्हें ।
बनना पड़ेगा कठोर
अपनी संतानों के प्रति
चाहे वह हो बेटा या बेटी।

नहीं चेते यदि समय पर तो-
भोगना ही होगा वह दुष्परिणाम
जिसकी कल्पना भी
नहीं करना चाहते हैं हम !



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