कविता : एक थी उम्मीद


“अमिताश्री”
कि फिर से आ मिलो
बहती नदी की धार सी काश तुम
आवाज अंतर्मन की तुम सुन ही लोगी
सागर का ऐसा दृढ़ विश्वास तुम...

है पड़ी मिटटी के भीतर सुप्त सी
कर दो ऐसी नेह की बरसात तुम
फूट कोपल बन उठे दरख्त वो
जिंदगी का मखमली अहसास तुम...

पेशानी पर शाम की सिलवटों के बाद
प्रथम प्रहर के नींद सी हो भोर तुम
हो उनींदी आंखों में सपनों के जैसे
आतुर हो सच को ऐसा आभास तुम...
किसने बांधा है तुम्हारे वेग को
मन परिंदा और हो आकाश तुम
नाप लो इस छोर से उस छोर तक
कर लो क्यों ना आज ही आगाज तुम...

वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।



और भी पढ़ें :