हिन्दी दिवस पर वामा साहित्य मंच का आयोजन


14 सितंबर हिन्दी दिवस के रूप में देश भर में मनाया जाता है। लेकिन क्या यह दिवस संस्कृति हमारी हिन्दी को बचा सकेगी या फिर हिन्दी को लेकर चिंताएं बेमानी है क्योंकि वास्तविकता तो यह है कि हर बदलते दौर में हिन्दी भाषा ने स्वयं को निखारा है। तकनीक का दामन थाम कर हिन्दी और हिन्दी भाषियों का आत्मविश्वास बढ़ा है।

क्या सच में हिन्दी के समक्ष अब खतरे नहीं है? क्या हिन्दी दूसरी भाषाओं के सामने चुनौती बन कर खड़ी हो रही है? हिन्दी ने दूसरी भाषाओं को आत्मसात कर अपना संसार निरंतर समृद्ध किया है। इन्हीं अहम पहलुओं पर के तत्वावधान में विचार व्यक्त किए गए। सदस्याओं ने अपनी बात रखी।

निधि जैन ने कहा कि मानवीकृत टेक्स्ट एनकोडिंग प्रणाली का अभाव तकनीकी दुनिया में हिन्दी की बुनियादी समस्या थी जो यूनिकोड की आशातीत सफलता के साथ लगभग हल हो गई। 5 साल में हिन्दी सामग्री में 94 % की बढ़ोतरी हुई जबकि अंग्रेज़ी में 19 % की। अंग्रेज़ी वाली हर संभावनाएं अब हिन्दी में भी है ज़रूरत है तो बस इसकी उपयोगिता बनाए रखने की। ताकि कोई यह नहीं कह सके कि तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी निष्क्रिय है, उपेक्षित है। सचिव ज्योति जैन ने कहा कि आज विदेशों में भी हिन्दी बड़े चाव से बोली, लिखी और समझी जाती है। यहां तक कि जो शब्द हम हिन्दी में बोलते हैं वे भी अधिकांश दूसरी भाषा के हैं, ऐसे में यह सिद्ध होता है कि हिन्दी ने हर भाषा को सहजता से गले से लगाया है। वामा साहित्य मंच की विनीता शर्मा, मधु व्यास, उषा तोमर तथा विनीता चौहान ने भी अपने विचार रखें।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पत्रकार और वेबदुनिया (विश्व के प्रथम हिन्दी पोर्टल) के संपादक जयदीप कर्णिक ने 'नित नवीन तकनीक के बीच हिन्दी की समृद्धि' विषय के अनुरूप अपना ओजस्वी उद्बोधन दिया।

श्री कर्णिक ने कहा कि, हिन्दी ने तकनीक को सहर्ष अपनाया है, यही वजह है कि वह निरंतर पुष्पित और पल्लवित हो रही है। अब तक चाहे तकनीक हिन्दी को अपनाने में संकोच करती रही हो लेकिन अब तकनीक भी जानती है कि हिन्दी के बिना उसका गुजारा संभव नहीं है। देश और देश के बाहर बैठे करोड़ों हिन्दी प्रेमी ही हिन्दी की ताकत है जिसके समक्ष तकनीक को भी झुकना पड़ा है। आज दोनों का सुखद संयोग ही है कि कुछ समय पहले जो आशंका जाहिर की जाती थी कि हिन्दी का अस्तित्व खतरे में है वह आशंका आज निर्मूल सिद्ध हुई है। हिन्दी ने अपना वर्चस्व स्थापित किया है, कर रही है ,बस हमें अपने मानस से भ्रम और भय को दूर करना है।

कार्यक्रम के आरंभ में स्वागत उद्बोधन अध्यक्ष पद्मा राजेन्द्र ने दिया। सरस्वती वंदना गायत्री मेहता ने प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत डॉ. प्रेम कुमारी नाहटा ने किया तथा स्मृति चिन्ह उपाध्यक्ष अमर चड्ढ़ा ने दिया। कार्यक्रम का संचालन स्मृति आदित्य ने किया। आभार ज्योति जैन ने माना। इस अवसर पर वामा साहित्य मंच की सदस्या उपस्थित थीं। कुछ सदस्याओं ने श्री कर्णिक से इंटरनेट पर हिन्दी की प्रतिभागिता संबंधी अपनी जिज्ञासा भी रखीं।

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