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बीफ पर बयानबाज़ी नहीं, कार्रवाई होनी चाहिए




फ़िरदौस ख़ान
गंगा-जमुनी तहजीब हमारे देश की रूह है। संतों-फकीरों ने इसे परवान चढ़ाया है। प्रेम और भाईचारा इस देश की मिट्टी के जर्रे-जर्रे में है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हमारे देश की संस्कृति के कई इंद्रधनुषी रंग देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक तौर पर विविधता है, कहीं बर्फ से ढके पहाड़ हैं, कहीं घने जंगल हैं, कहीं कल-कल करती नदियां हैं, कहीं दूर-दूर तक फैला रेगिस्तान है, तो कहीं नीले समंदर का चमकीला किनारा है। विभिन्न इलाकों के लोगों की अपनी अलग संस्कॄति है, अलग भाषा है, अलग रहन-सहन है और उनके खान-पान भी एक-दूसरे से काफी अलग हैं। इतनी विभिन्नता के बाद भी सबमें एकता है, भाईचारा है, समरसता है। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं। देश के किसी भी इलाके में कोई मुसीबत आती है, तो पूरा देश इकट्ठा हो जाता है। कोने-कोने से मुसीबतजदा इलाके के लिए मदद आने लगती है। मामला चाहे बाढ़ का हो, भूकंप का हो या फिर कोई अन्य हादसा हो, सबके दुख-सुख साझा होते हैं।
 
कितने अफसोस की बात है कि पिछले तीन सालों में कई ऐसे वाकि‍यात हुए हैं, जिन्होंने सामाजिक समरस्ता में जहर घोलने की कोशिश की है, सांप्रदायिक सद्भाव को चोट पहुंचाने की कोशिश की है। अमीर और गरीब के बीच की खाई को और गहरा करने की कोशिश की है, मजहब के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश की है, जात-पांत के नाम पर एक-दूसरे को लड़ाने की कोशिश की है। इसके कई कारण हैं, मसलन अमीरों को तमाम तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं, उन्हें टैक्स में छूट दी जा रही है, उनके टैक्स माफ किए जा रहे हैं, उनके कर्ज माफ किए जा रहे हैं। गरीबों पर नित-नए टैक्स का बोझ डाला जा रहा है। आए-दिन खाद्यान्न और रोजमर्रा में काम आने वाली चीजों के दाम बढ़ाए जा रहे हैं। गरीबों की थाली से दाल तक छीन ली गई। हालत यह है कि अब उनकी जमा पूंजी पर भी आंखें गड़ा ली गई हैं। पाई-पाई जोड़कर जमा किए गए पीएफ और ईपीफ पर टैक्स लगा कर उसे भी हड़प लेने की साजि‍श की गई। नौकरीपेशा लोगों के लिए पीएफ और ईपीएफ एक बड़ा आर्थिक सहारा होता है। मरीजों को भी नहीं बख्शा जा रहा है। दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं के दाम भी बहुत ज्यादा बढ़ा दिए गए हैं, ऐसे में गरीब मरीज अपना इलाज कैसे करा पाएंगे, इसकी को कोई फि‍क्र नहीं है। नोटबंदी कर लोगों का जीना मुहाल कर दिया। नोट बदलवाने के लिए लोग कड़ाके की ठंड में रात-रात भर बैंकों के आगे सड़कों पर खड़े रहे। कतारों में लगे-लगे कई लोगों की जान तक चली गई। किसानों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। गले तक कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करने वाले किसानों पर गोलियां दागी जा रही हैं, उनकी हत्या की जा रही है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडू कह रहे हैं कि कर्ज माफी अब फैशन बन चुका है।
 
समाज में हाशिये पर रहने वाले तबकों की आवाज को भी कुचलने की कोशिश की जा रही है। आदिवासियों को उजाड़ा जा रहा है। जल, जंगल और जमीन के लिए संघर्ष करने वाले आदिवासियों को नक्सली कहकर प्रताड़ित करने का सिलसिला जारी है। हद तो यह है कि सेना के जवान तक आदिवासी महिलाओं पर जुल्म ढहा रहे हैं, उनका शारीरिक शोषण कर रहे हैं। दलितों पर अत्याचार बढ़ गए हैं। जुल्म के खिलाफ बोलने पर दलितों को देशद्रोही कहकर उन्हें सरेआम पीटा जाता है। गाय के नाम पर मुसलमान निशाने पर हैं। अपने हक के लिए आवाज उठाने पर उन्हें दहशतगर्द करार दे दिया जाता है। 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नया बयान दिया है कि गौभक्ति के नाम पर इंसानों का कत्ल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। हालांकि कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी पर पलटवार करते हुए कहा है कि बहुत देर हो गई। कहने से कुछ नहीं होगा, जब तक कार्रवाई नहीं की जाती। प्रधानमंत्री का यह बयान उस वक्त आया था जब तथाकथित गौरक्षकों ने गुजरात के ऊना में दलितों को बुरी तरह पीटा था। लेकिन गौरक्षकों पर इस बयान का कोई असर नहीं हुआ, क्योंकि वह जानते हैं कि और बयानों की तरह यह बयान भी सिर्फ जुमला ही होगा। प्रधानमंत्री के बयान के चंद घंटों के बाद ही झारखंड के रामगढ़ में बेरहमी से एक व्यक्ति का कत्ल कर दिया गया और उसकी जीप को आग लगा दी गई। आए दिन ऐसे खौफनाक वाकिये सामने आ रहे हैं।
 
दादरी के अख्लाक कांड में जिस तरह एक बेकसूर व्यक्ति पर खाने का इल्जाम लगाकर उसका कत्ल किया गया, उसने मुसलमानों के दिल में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी। कभी उन्हें घर में घुस कर मार दिया जाता है, कभी सड़क पर कत्ल कर दिया जाता है, तो कभी रेल में सफर कर रहे युवक पर हमला करके उसकी जान ले ली जाती है। मुसलमानों को लगने लगा कि वे अपने देश में ही महफूज नहीं हैं। देश के कई हिस्सों में बीफ-बीफ कहकर कुछ असामाजिक तत्वों ने समुदाय विशेष के लोगों के साथ अपनी रंजिश निकाली। जिस तरह मुस्लिम देशों में ईश निंदा के नाम पर गैर मुसलमानों को निशाना बनाया जाता रहा है, वैसा ही अब हमारे देश में भी होने लगा है। दरअसल, भारत का भी तालिबानीकरण होने लगा है। दलितों पर अत्याचार के मामले आए-दिन देखने-सुनने को मिलते रहते हैं। आजादी के इतने दशकों बाद भी दलितों के प्रति लोगों की सोच में कोई खास बदलाव नहीं आया है। गांव-देहात में हालात बहुत खराब हैं। न तो मंदिरों में प्रवेश कर सकते हैं और न ही शादी-ब्याह के मौके पर दूल्हा घोड़ी पर चढ़ सकता है। उनके साथ छुआछूत का तो एक लंबा इतिहास है। पिछले दिनों की मांग को लेकर हरियाणा में हुए उग्र जाट आंदोलन ने सामाजिक समरसता को चोट पहुंचाई है। आरक्षण के नाम पर लोग जातियों में बट गए हैं। जो लोग पहले 36 बिरादरी को साथ लेकर चलने की बात करते थे, अब वही अपनी-अपनी जाति का राग आलाप रहे हैं।
 
अंग्रेजों की नीति थी- फूट डालो और राज करो। अंग्रेज तो विदेशी थे, उन्होंने इस देश के लोगों में फूट डाली और और एक लंबे अरसे तक शासन किया। उन्हें इस देश से प्यार नहीं था। लेकिन इस वक्त जो लोग सत्ता में हैं, वे तो इसी देश के वासी हैं। फिर क्यों वे सामाजिक सद्भाव को खराब करने वाले लोगों का साथ दे रहे हैं। उन्हें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि जब कोई सियासी दल सत्ता में आता है, तो वह सिर्फ अपनी विचारधारा के मुट्ठी भर लोगों पर ही शासन नहीं करता, बल्कि वह एक देश पर शासन करता है। इसलिए यह उसका नैतिक दायित्व है कि वह उन लोगों को भी समान समझे, जो उसकी विपरीत विधारधारा के हैं। सरकार पार्टी विशेष की नहीं, बल्कि देश की समूची जनता का प्रतिनिधित्व करती है। सरकार को चाहिए कि वह जनता को फि‍जूल के मुद्दों में उलझाए रखने की बजाए कुछ सार्थक काम करे। सरकार का सबसे पहला काम देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने और देश में चैन-अमन का माहौल कायम रखना है। इसके बाद जनता को बुनियादें सुवाधाएं मुहैया कराना है। बाकी बातें बाद की हैं। सुनहरे भविष्य के ख़्वाब देखना बुरा नहीं है, लेकिन जनता की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज करके उसे सब्ज बाग दिखाने को किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता। बेहतर तो यह होगा कि चुनाव के दौरान जनता से किए गए वादों को पूरा करने का काम शुरू किया जाए। साथ ही सामाजिक समरसता में जहर घोलने वाले लोगों के खि‍लाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।
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