पुस्तक समीक्षा : 'रसराज- पंडित जसराज'

Pandit Jasraj
 
- सुनीता बुद्धिराजा> > वरिष्ठ लेखिका व संगीत अध्येता सुनीता बुद्धिराजा की संगीत मार्तंड पद्मविभूषण पं. जसराज के जीवन पर आधारित पहली जीवनी
 
जसराज के जन्मते ही पिता पं. मोतीराम ने उन्हें शहद चटाया था। उनके घर में इसे घुट्टी पिलाना कहा जाता है। मां कृष्णा बाई का कहना था कि सभी बच्चों में से मोतीरामजी ने केवल जसराज को ही शहद चटाया था। बच्चों को मां की सेवा करने का अच्छा अवसर मिला, क्योंकि वे 1957 तक जीवित रहीं। पिता तो अपने गाने के सिलसिले में आते-जाते रहते थे।
 
गांव पीली मन्दौरी, जहां हुआ हिसार (हरियाणा) से लगभग 70 किलोमीटर दूर है। उस समय वह पंजाब में था। गांव से स्टेशन लगभग 12 किलोमीटर था। एक दिन पं. मोतीराम कहीं से कार्यक्रम करके गांव लौटे। चूंकि स्टेशन और गांव के बीच दूरी बहुत थी, तो ऊंट पर सवार होकर आए थे। साफ-सुथरे सफेद कपड़े पहने हुए थे। मैदान में छोटे-छोटे बहुत सारे बच्चे खेल रहे थे।
 
एक बच्चे की तरफ इशारा करके पं. मोतीराम ने किसी से पूछा कि भैया, ये किसका बच्चा है? तो उन्हें उत्तर मिला कि ये आप ही का बच्चा है। वे फौरन ऊंट से उतर पड़े और धूल में नहाए जसराज को गोदी में उठा लिया। न अपने सफेद कपड़ों की परवाह की और न ही दो-ढाई वर्ष के जसराज की धूल में सनी पोशाक की ओर देखा। गोदी में उन्हें उठाकर पैदल-पैदल घर आ गए। उसके बाद क्या हुआ, इसकी स्मृति किसी को नहीं है। पं. जसराज अपने माता-पिता की नौवीं संतान हैं।
 
दरस देत क्यूं नी
राग जयजयवंती, ताल तीन ताल
 
पं. जसराज के आध्यात्मिक गुरु महाराज जयवंत सिंहजी वाघेला, जिन्हें सब 'बापू साहब' कहकर पुकारते थे, को राग जयजयवंती बहुत पसंद था। वे अक्सर पं. जसराज से पूछते कि तुम जयजयवंती राग को क्यों कभी नहीं सुनाते? मैंने यह बंदिश विशेष रूप से तुम्हारे लिए लिखी है। 
 
बापू साहब रचित बंदिश एक विलंबित रचना थी जिसमें बंदिश के चारों तत्त्वकृस्थायी अंतरा, अभोग और संचारी को बहुत खूबसूरती से संजोया गया था। बापू साहब के देहांत के पश्चात पं. जसराज को इस बात का विशेष कष्ट रहा कि वे अपने आध्यात्मिक गुरु की इच्छा को पूरा नहीं कर पाए और उन्होंने माताजी (काली मां) की स्तुति में राग जयजयवंती में एक अन्य बंदिश की रचना की जिसे वे अनेकश: अपने गायन में सम्मिलित करते हैं।
 
स्थायी
दरस देत क्यूं नी मां मोरी।
मनमंदिर में तू ही बिराजत।
परख लेत क्यूं नी (मां मोरी)
 
अंतरा
बिपदा है मोपे अति भारी।
हरत लेत क्यूं नी मां मोरी।
कहनी थी सों कहली माता।
समझ लेत क्यूं नी (मां मोरी)
 
 
पेशे से जनसंपर्क से जुड़ीं सुनीता बुद्धिराजा 'किंडलवुड कम्युनिकेशंस' चला रही हैं। प्रस्तुत है उनकी नई पुस्तक 'रसराज- पंडित जसराज' जो संगीत मार्तंड पं. जसराज की जीवनगाथा पर आधारित है। हाल ही में 'रसराज- पंडित जसराज' पुस्तक का लोकार्पण न्यूयॉर्क में किया गया।
 
रु. 950/- • 978-93-87889-58-3 • हार्ड कवर। 
रु. 895/- • 978-93-8788-61-3 • पेपरबैक। 
जीवनगाथा • पृष्ठ संख्या- 534
साभार -वाणी प्रकाशन 

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