पुस्तक समीक्षा : बॉम्बे मेरी जान

हर मुंबईकर का इस मायानगरी से अपनी तरह का अलग रिश्ता बनता है। मैंने अपने ही परिवार के ऐसे भी कुछ लोग देखे हैं जो पिछले पांच दशक से इस शहर में रहते हुए भी इस शहर को जीने के बजाए रोते हैं। एक शहर भर नहीं है, जिंदगी जीने और अपने आपको समझने का एक गेटवे भी है।
 
धीरे-से और बहुत चुपके से यह शहर कब आपके अंदर बसने लगता है और कब आपकी रगों में यह उल्लास और गति बनकर दौड़ने लगता है आपको पता ही नहीं चलता। पहली बार वड़ा पाव का स्वाद आपको अजीब-सा लग सकता है। सड़क किनारे पाव-भाजी के खोमचों पर भारी भीड़ देख आप चौंक सकते हैं। लेकिन बहुत जल्द आप भी उस भीड़ का हिस्सा बनने लगते हैं। बड़े-से तवे पर कलछुल की झनाझन मार...लहसुन की चटनी की तीखी गंध आपकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं।
 
एक बार जब आप इस मायानगरी के रंग में रंग जाते हैं, तो रात-दिन की भाग-दौड़, आसपास की भीड़ में भी अपनेपन का अहसास होने लगता है। हर दिन दफ्तर आते-जाते मुंबई की लोकल ट्रेन में आपको नए किरदार देखने-बुनने को मिलते हैं। ना जाने कितनी कहानियां हर वक्त आपके आसपास तैरती रहती हैं। मुंबई को अगर जानना है, तो खुद एक कहानी बनना होगा।
 
पंद्रह साल मुंबई में रहने के बाद जब मैं दिल्ली आई, तो सालों तक वहां की तेजी, रवानगी, प्रोफेशनलिज्म और हल्ला-गुल्ला मिस करती रही। आज भी करती हूं। मेरे सपने में आज भी मुंबई जागता है, मुझे बुलाता है। आज भी दिल के अंदर कहीं ना कहीं एक मासूम सी ख्वाहिश है...एक दिन...
 
पुस्तक : बॉम्बे मेरी जान 
लेखिका : जयंती रंगनाथन 
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 
मूल्य : 350 रूपए 

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