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यह इस युग की विडंबना ही है कि हम मान कर चलते हैं कि पश्चिम से आया सब स्वीकृत है। सब आधुनिक है। सब आकर्षक है। वहीं दूसरी तरफ एक और वर्ग है जो बिना दिमाग पर जोर दिए पश्चिम को कोसने की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। सवाल है कि क्या पश्चिम से आया सब अनैतिक और अमान्य होता है? या कि सचमुच पाश्चात्य संस्कृति हमें आधुनिक जीवन जीने की कला सीखाती है। सवाल के जवाब में एक चिंता और एक विश्वास दोनों एक साथ उभरते हैं।

वास्तव में हमारी संस्कृति का विराट वृक्ष इतना कमजोर नहीं है कि अश्लीलता की दीमक मात्र से खोखला हो जाए लेकिन इसी के साथ-साथ चलता यह 'सच' भी परेशान कर रहा है कि हम पश्चिम के अंधानुकरण से मूल्यहीनता का शिकार हो रहें हैं। पश्चिम की नकल करते हुए हम अपने विवेक से काम क्यों नहीं लेते? विदेशों से फिल्मों की कहानी चुराना अब चौंकाने वाला तथ्य नहीं रहा। आज हम वहाँ के टीवी शो उठा रहे हैं।

क्या सब बेकार होता है वहाँ पर?
बात थोड़ी सी कड़वी जरूर है मगर औषधि की तरह निगलना होगी। वहाँ का सब कुछ त्याज्य नहीं है। वहाँ की नैतिकता, वहाँ की सामाजिक जागरूकता, वहाँ का अनुशासन, वहाँ की राष्ट्रभक्ति और वहाँ के प्रतिबद्धताएँ कई मायनों में हमसे बेहतर होती है। प्रश्न यह है कि हमें वह सब क्यों नहीं दिखता? हम उसे अपनाने की पहल क्यों नहीं कर पाते?

बिग बी और बिग बॉस
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नक्कालों का सजता बाजार
पिछले कुछ सालों से भारत में विदेशी टीवी शो की नकल धड़ल्ले से हो रही है। चाहे सच का सामना हो या पति, पत्नी और वो' या चाहे आज का सर्वाधिक लोकप्रिय 'बिग बॉस'। सभी विदेशों से चुराई रेसिपी है जिसे भारतीय मसालों का छौंक लगाकर परोसा जा रहा है। मगर यहाँ नक्काल यह भूल जाते हैं कि भारतीय जुबान का जायका किस हद तक तीखा और किस हद तक मीठा बर्दाश्त कर सकता हैं। चाहे हम विदेशों से 'तथाकथित' प्रेरणा लेकर शो बनाएँ लेकिन उस शो की भारतीयता बनी रहे। शो के माध्यम से भारत के सामाजिक मूल्य कायम रहें यह जिम्मेदारी किसकी है?

शो और भी हैं
अब अगर विदेशों से शो चुराना ही हमारी मजबूरी हैं और हमारी अपनी मौलिक सोच पर ताले पड़ गए हैं तो हमारी आँखें पूरी तरह से खुली क्यों नहीं? हम वहाँ के बकवास और बिना किसी उद्देश्य के बने फालतू शो ही क्यों उठा रहे हैं? जिनका हमारी आम जिंदगी से कोई वास्ता नहीं। क्यों नहीं दिखाई देती हमें ओपेरा विन्फ्रै? जिनके उच्च स्तरीय टॉक शो ने अमेरिका के टेलीविजन इतिहास में कामयाबी के झंडे गाड़ दिए हैं?

यह शो ना सिर्फ महिलाओं के मुद्दों के प्रति संवेदनशील है बल्कि अमेरिका के कई अहम और अनछुए मुद्दों को ओपेरा ने शो के द्वारा स्पर्श किया है ‍जिसने अमेरिका के सभ्य समाज में हलचल मचा दी। विश्वस्तरीय घटनाओं पर विचार, सेलिब्रिटीज के इंटरव्यू, व्यक्तित्व विकास और सनसनीखेज मुद्दों पर बेबाकी से प्रश्न खड़े करती ओपेरा ने वैश्विक स्तर पर बौद्धिक महिला की सकारात्मक छबि पेश की है। हमारे देश में कितने ऐसे टीवी शो हैं जो पर्याप्त रेटिंग बटोर पाते हैं?

स्व. प्रिया तेंडूलकर के बाद किरण खेर ने कुछ उम्मीद बँधाई थी। मगर, फिर टीआरपी की चूहा दौड़ में वह भी अजीबोजरीब हरकतें करने वाले शो ' इंडिया गॉट टैलेंट' का हिस्सा बन गईं। सवाल यह है कि मनोरंजन के नाम पर कुछ भी करेगा कि तर्ज पर बनने वाले ये शो आखिर कितना और कैसा मनोरंजन दे रहे हैं? क्यों हमारे टीवी पर विचारोत्तेजक सार्थक श्रृंखला नहीं मिलती?

क्यों मिलते हैं एक की प्रतिस्पर्धा में शुरू, ढेर सारे सस्ते सनसनी और गंदगी फैलाने वाले घटिया शो? यह तो उसी तरह हुआ कि जैसे पॉप संगीत को भारत उठाकर लाने वाले भूल गए वहाँ के सिंफनी और बैले के सुर-ताल-लय और तरंग को? और अन्तत: हम सबने मान लिया चीखने-चिल्लाने वाला म्यूजिक मतलब विदेशी।

इस देश में एम टीवी को देखने वाले ज्यादा है और दूरदर्शन पर भारतीय शास्त्रीय नृत्यों को देखने वाले बचे ही नहीं हैं। 100 अरब से ज्यादा की आबादी और दुनिया के सबसे बड़े जैव-विविधता के क्षेत्रों शामिल भारत में एक भी चैनल का कोई भी शो इतिहास, पर्यावरण, वन्य पशुओं या शिक्षा से संबंधित नहीं है, ऐसा भी नहीं है कि इन कार्यक्रमों को कोई देखने वाला नहीं है। इन्ही मुद्दों पर हिस्ट्री चैनल, डिस्कवरी, एनिमल प्लैनेट, लिविंग एंड ट्रेवल, नेशनल ज्यॉग्रॉफी जैसे कितने ही चैनल आज भारतीय भाषाओं में अनुवादित विश्व स्तर के टीवी शो दिखा रहे हैं जिनके दर्शकों की संख्या आज करोड़ो में पहुँच गई है।

विदेशी श्रेष्ठतम धारावाहिकों की एक नहीं लंबी श्रृंखला है। मगर हमने उनकी नकल बनाने की हिम्मत नहीं दिखाई। एक झूठ अपना रखा है कि ऐसे शो नहीं चलते जो स्तर बनाए रखते हैं। जानकारी और शिक्षाप्रद होते है, जिनमें स्वस्थ समाज की हिमायत की जाती है। सच इसके एकदम उलट है। विश्व के सर्वाधिक चर्चित और लोकप्रिय टीवी शो ऐसे हैं जिनमें अश्लीलता नहीं आदर्श हैं। फुहड़ता नहीं कॉमेडी है और सेक्स नहीं सीख है। फिर यह भ्रम कौन फैला रहा है कि अच्छे शो बिकते नहीं इसलिए दिखते नहीं?

क्या दर्शक मासूम हैं?
अब जरा खुद का मूल्यांकन करें। टीवी शो अगर बकवास है, संस्कृति के विरूद्ध है तो उसे देखा ही क्यों जाएँ? पर नहीं। हमें जब रस आता है तब हम उसका आनंद उठाकर टीआरपी बढ़ाने में भूमिका निभाते है और जब हम सार्वजनिक भूमिका में आते हैं तो उसी पर गालियाँ निकालते हैं। यह दोगलापन जब तक दर्शक छोड़ नहीं देता तब तक टीवी शो के स्तर में गिरावट बढ़ती रहेगी। मीडिया के विरूद्ध किया जाने वाला 'प्रलाप' जब तक सही 'आलाप' नहीं लेता यह संताप कम नहीं होने वाला।

मीडिया वही दिखाती है जो आप देखते हैं। और आपकी इसी (कु)रूचि का जब प्रचार-प्रसार होता है तो उसे और अधिक बढ़ावा देने के लिए ऐसे उटपटाँग शो की झड़ी लग जाती है। सबसे पहली जिम्मेदारी हमारी अपने आप के प्रति है कि हम स्वनियंत्रण से यह तय करें कि हमारे घरों में चलने वाला टीवी 'घरेलू' संस्कारों के प्रति जिम्मेदार बना रहे। याद रखें कि रिमोट टीवी को नियंत्रित करता है और रिमोट को हम।

भारतीयता बची रहे
ND
अपने मूल्यों को हमें ही सहेजना है
हमारे समक्ष एक पूरा खुला बाजार खड़ा है। ये हम पर निर्भर करता है कि हम अपने घर में वहाँ से क्या उठाकर लाते हैं, या क्या खरीदकर लाते हैं? हम अपने घर में वही लाते हैं जो उपयोगी है, जरूरत का है, जो खुशी देता है, जो अच्छा लगता है। जब वस्तुओं के चयन में इतनी सावधानी तो फिर मूल्यों के चयन में यह लापरवाही क्यों? हम 'सार सार को गही रहे, थोथा देहि उड़ाय' के संदेश का आदर्श अपनाएँ तो वही बचेगा जो सार्थक है, सही है, सुखद है।

और विदेशों से कुछ लेना ही है तो उन्हें भारतीय मूल्य, परिवेश, जीवनशैली और सभ्यता के अनुरूप अपनाएँ। नैतिकता और गरिमा को लेकर हर देश की अपनी मान्यताएँ हैं, अपने आदर्श हैं। वे हमारे लिए कितने उपयोगी हैं इसका 'फिल्टर' हमें ही लगाना होगा।

हमारे देश की भी अपनी गौरवशाली संस्कृति है। यहाँ का योग वहाँ से 'योगा' बनकर आए तो हमें फैशनेबल लगता हैं। तो क्यों ना यही सीखें हम पाश्चात्य से कि किसी भी देश की अच्छाई को ग्रहण कर लें। और वह भी तुरंत और तत्काल नहीं बल्कि गहन अध्ययन और शोध के उपरांत अपनी उपयोगिता को समझते हुए। वे हमारी हर अच्छी चीज को पर्याप्त शोध के पश्चात अपना रहे हैं और हम उनकी हर बुरी चीज बिना तोल-मोल के तेजी से उठाए जा रहे हैं, तो खुद ही मूल्यांकन करें कि गलती किसकी है?

बाजार तो खुला है मूल्यों का भी और वस्तुओं का भी। चयन का विवेक अपने आप में हमें विकसित करना है। अगर वहाँ से कुछ अच्छा लेकर आएँ तो किसे आपत्ति होगी? किसी को नहीं। और नकल पर निर्भरता कब तक? क्यों ना खुद की अकल चलाएँ। कुछ ऐसा बनाए कि विदेशों में उसकी नकल बन जाए।
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