| | कामख्या धाम का प्रसिद्ध अंबुवासी मेला | | | कामरूप का कुंभ है अंबुवासी मेला़ | | | | | | | | |
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| - रविशंकर रवि तंत्र-मंत्र साधना के लिए विख्यात कामरूप कामाख्या (गुवाहाटी) में शक्ति की देवी कामाख्या के मंदिर में प्रतिवर्ष होने वाले 'अंबुवासी' मेले को कामरूप का कुंभ माना जा सकता है। इसमें भाग लेने के लिए देश भर के साधुओं और तांत्रिकों यहाँ आते हैं। शक्ति के ये साधक नीलाचल पहाड़ (जिस पर माँ कामाख्या का मंदिर स्थित है) की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना करते हैं। अंबुवासी मेले के दौरान अजीबो-गरीब हठयोगी पहुँचते हैं। कोई अपनी दस-बारह फुट लंबी जटाओं के कारण कौतूहल का कारण बना रहता है, कोई पानी में बैठकर साधना करता है तो कोई एक पैर पर खड़े होकर। चार दिनों के अंबुवासी मेले में चार से पाँच लाख श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं। इतना बड़ा धार्मिक जमावड़ा पूर्वोत्तर में और कहीं नहीं लगता है। यहाँ से जुड़ी मान्यताएँ : ऐसी मान्यता है कि 'अंबुवासी मेले' के दौरान माँ कामाख्या रजस्वला होती हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सौर आषाढ माह के मृगशिरा नक्षत्र के तृतीय चरण बीत जाने पर चतुर्थ चरण में आद्रा पाद के मध्य में पृथ्वी ऋतुवती होती है। | | इन चार दिनों के दौरान असम में भी कोई शुभ कार्य नहीं होता है।
विधवाएँ, साधु-संत आदि अग्नि को नहीं छूते हैं और आग में पका भोजन नहीं करते हैं। पट खुलने के बाद श्रद्धालु माँ पर चढ़ाए गए लाल कपड़े के टुकड़े पाकर धन्य हो जाते हैं। |
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यह मान्यता है कि भगवान विष्णु के चक्र से खंड-खंड हुई सती की योनी नीलाचल पहाड़ पर गिरी थी। इक्यावन शक्तिपीठों में कामाख्या महापीठ को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसलिए कामाख्या मंदिर में माँ की योनी की पूजा होती है। यही वजह है कि कामाख्या मंदिर के गर्भगृह के फोटो लेने पर पाबंदी है इसलिए तीन दिनों तक मंदिर में प्रवेश करने की मनाही होती है। चौथे दिन मंदिर का पट खुलता है और विशेष पूजा के बाद भक्तों को दर्शन का मौका मिलता है। मान्यता यह भी है कि उस दौरान माँ कामाख्या पीठ अधिक जाग्रत हो जाता है इसलिए उस दौरान साधना का विशेष फल मिलता है। एक मान्यता यह भी है कि रतिपति कामदेव शिव की क्रोधाग्नि में यहीं भस्म हुए थे। कामदेव ने अपना पूर्वरूप भी यहीं प्राप्त किया इसलिए इस क्षेत्र का नाम कामरूप पड़ा। इस बात का उल्लेख कल्कि पुराण में है। साधु और तांत्रिक मंदिर के आसपास की वीरान जगहों और कंदराओं में साधना में लीन रहते हैं। उस दौरान चार दिनों के लिए मंदिर का पट बंद रहता है और चार दिन बाद पट खुलने पर पूजा-अर्चना के बाद ही श्रद्धालु लौटते हैं। मुंबई, अहमदाबाद, नागपुर के अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के लाखों लोग जुटते हैं। हिंदू समाज में रजोवृति के दौरान शुभ कार्य नहीं होता है इसलिए इन चार दिनों के दौरान असम में भी कोई शुभ कार्य नहीं होता है। विधवाएँ, साधु-संत आदि अग्नि को नहीं छूते हैं और आग में पका भोजन नहीं करते हैं। पट खुलने के बाद श्रद्धालु माँ पर चढ़ाए गए लाल कपड़े के टुकड़े पाकर धन्य हो जाते हैं। मान्यता है कि इस लाल कपड़े का अंश मात्र मिल जाने से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं। | | कोई अपनी दस-बारह फुट लंबी जटाओं के कारण कौतूहल का कारण बना रहता है, कोई पानी में बैठकर साधना करता है तो कोई एक पैर पर खड़े होकर। चार दिनों के अंबुवासी मेले में चार से पाँच लाख श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं। |
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कामाख्या धाम की अन्य विशेषताएँ : वैसे भी कामाख्या मंदिर अपनी भौगोलिक विशेषताओं के कारण बेहतर पर्यटन स्थल है और साल भर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यह पहाड़ ब्रह्मपुत्र नदी से बिल्कुल सटा है। सामने ब्रह्मपुत्र के बीच में स्थित छोटी सी पहाड़ी पर शिव का उमानंद मंदिर है। यह माना जाता है कि वहाँ विराजवान शिव ही कामाख्या माता के भैरव हैं, इसलिए कामाख्या आने वाले भक्त उमानंद मंदिर भी जरूर जाते हैं। पूरा मंदिर बड़े-बड़े पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। भूकंप प्रभावित क्षेत्र होने के कारण मंदिर का गर्भगृह बाहरी सतह से करीब दस फुट नीचे चला गया है, जहाँ तक जाने के लिए सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। राजा नर नारायण ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। अहोम राजाओं ने इसी मंदिर में नियमित पूजापाठ के लिए कन्नौज और मिथिला से ब्राह्मणों को यहां लाकर बसाया था। आज नीलाचल पहाड़ पर बसे सभी पंडों के पूर्वज मिथिला या कन्नौज से आए थे लेकिन ये सारे लोग असमिया संस्कृति में इस कदर रच-बस गए हैं कि पता करना मुश्किल होता है। पहाड़ पर मंदिर के सामने ही एक तालाब भी है। वैसे पूरे पहाड़ पर मंदिर ही मंदिर हैं। नीलाचल पहाड़ की चोटी पर भुवनेश्वरी देवी का मंदिर है, जहाँ से पूरे गुवाहाटी महानगर को निहारा जा सकता है। मंदिर परिसर तक बस सेवा उपलब्ध है। पैदल मार्ग अलग है। अन्य कई तीर्थस्थलों की तुलना में यहाँ पंडे सरल और सीधे हैं तथा दक्षिणा के लिए कभी दबाव नहीं डालते हैं।नोट : इस वर्ष कामख्या शक्तिपीठ का 'अंबुवासी मेला' 22 जून से 25 जून तक चलेगा। |
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