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कैलाश-मानसरोवर यात्रा
आध्यात्मिक केंद्र चार धर्मों का
WDWD
डिरापुक नामक स्थान पर टेंट डालकर हमारा रात्री पड़ाव था। कैलाश पर्वत के नीचे हमने रात बिताई। प्रातः दूसरे दिन की यात्रा चाय नाश्ते के पश्चात शुरू की गई। सूर्य की किरणें जब कैलाश पर्वत पर पड़ती थी तब वह स्वर्णीम छटा से हमें अभिभूत कर देता था। वहाँ से कैलाश के उत्तरी हिस्से के दर्शन होते हैं। अब हमारा दल सबसे कठिन यात्रा के लिये शारीरिक व मानसिक रूप से तैयार हो गया। पथरीली पहाड़ी व ऊँची चढ़ाई पर हम 19000 फीट पर पहुँच गये। यह स्थान डोलमाला पास था वहाँ से भी कैलाश के दर्शन होते है।

आगे बड़ी-बड़ी चट्टाने पार करते हुये हमने अद्भूद दृश्य एक ग्लेशियर के रूप में देखा। हमे उस पार करना था बीच में साढ़े तीन से चार फिट चौड़ी दरार छड़ी द्वारा बर्फ के घनत्व का आंकलन कर हमने उसे जय कैलाश बोलकर एक दूसरे की मदद से छलांगा। यदि कोई चूक हो जाती तो हम सीधे नीचे दरार के नीचे गहरे बर्फीले पानी में हो सकते थे। इसके बाद फिर पत्थरीली ढलान थी उसी बीच हमने एक जल कुंड देखा।

  आगे बड़ी-बड़ी चट्टाने पार करते हुये हमने अद्भूद दृश्य एक ग्लेशियर के रूप में देखा। हमे उस पार करना था बीच में साढ़े तीन से चार फिट चौड़ी दरार छड़ी द्वारा बर्फ के घनत्व का आंकलन कर हमने उसे जय कैलाश बोलकर एक दूसरे की मदद से छलांगा।      
थक कर हम चूर हो गये। तथा पैर कई बार आगे बढ़ने से इंकार कर रहे थे पढ़ाव पर पहुँचने के बाद चाय पीकर व रात्री भोजन के पश्चात हम स्लीपिंग में धाराशाई हो गए। सुबह उठने पर बाहर का तापमान (-2) सेंटीग्रेड था। जब हमने टेंट को बाहर से देखा तो उस पर बर्फ की परत जमी थी। अब यह यात्रा का अंतिम दिन था।

यात्रा शुरू हुई व कुछ हद तक समतल थी उतार चढ़ाव नाले झरने पार करते हुए हम चलते जा रहे थे दूर से हमें नीले पानी की लकीर सी दिखी जो राक्षस ताल थी। आगे जब हमारे मान सरोवर में रूके अन्य साथी दिखे तो हृदय भर आया क्योंकि वे हमारी अगवानी हेतु आये थे। साथ ही हमारी गाड़ियों भी हमारा रास्ता देख रही थी हम बहुत प्रसन्न थे कि इतनी कठिन यात्रा निर्विध्न सम्पन्न हुई।
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