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कैलाश-मानसरोवर यात्रा
आध्यात्मिक केंद्र चार धर्मों का
WDWD
डायनामाईट बुलडोजर व स्कूपर की सहायता से रास्ता साफ हुआ व हमारा काफिला दोपहर को फिर आगे की ओर बढ़ गया। हमारा अगला पड़ाव नियालम नामक कस्बें में था जो समुद्र सतह से 1400 फुट ऊँचाई पर स्थित नियालम में रात गुजारने के बाद अगले दिन हमें सागा शहर केलिये 220 किमी सफर तय करना था। रास्तें पीकू ताल व ब्रह्मपुत्र नदी मिली, शीशा पर्वत श्रृंखला दिखी जो विश्व की चौथी सबसे ऊँची पर्वत श्रृंखला है यह 26300 फीट ऊँचाई पर है।

दूसरे दिन सुबह नाश्ते के बाद हमारी यात्रा सागा से परियाँग नाम की जगह की ओर बढ़ गई। जो 235 किमी का सफर था। शाम तक हम परियाँग पहुँच गये। यहाँ से दक्षिण में कुरला मंधाता पर्वत श्रृंखला दिखाई देती है इसके सामने उत्तर में कैलाश पर्वत स्थित है। रास्ते में डियुमला पास को हमने पार किया जो 17000 फुट की ऊँचाई पर है जो ड्राइविंग का अंतिम सबसे ऊँचा स्थान है।
  कैलाश दर्शन के बाद लगा स्वर्ग यहीं है । वहाँ से एक घंटे की यात्रा के बाद हमें दूर घने नीले रंग की रेखा दिखी वह मानसरोवर था पास आने पर वह स्पष्ट हो गया। उसका गहरा नीला रंग आकाश का रंग विभिन्ना आकारों के बादलों के समूह आज भी मन को गुदगुदाते हैं।      
अगला दिन हमारा लिये बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि हमें कैलाश व मानसरोवर के दर्शन होने वाले थे। जब हमारे ड्रायवर ने हमें कैलाश पर्वत दिखाया हम सब अचंभित हो गये। प्रथम कैलाश दर्शन के साथ ऐसा लगा जैसे स्वर्ग यहीं है अब कोई इच्छा शेष नहीं है। वहाँ से एक घंटे की यात्रा के बाद हमें दूर घने नीले रंग की रेखा दिखी वह मानसरोवर था पास आने पर वह स्पष्ट हो गया। उसका गहरा नीला रंग आकाश का रंग विभिन्ना आकारों के बादलोंके समुह आज भी मन को गुदगुदाते हैं। मानसरोवर से ही दूर एक मात्र बर्फ से ढका शिवलिंग के आकार का पर्वत दिखा। उस दिन निर्जला एकादशी होने से सभी ने मानसरोवर में स्नान कर पूजा अर्चना की उसके पश्चात 105 किमी की उसकी परिक्रमा गाड़ी में बैठकर तय की।

शाम को हमने ट्रेकिंग द्वारा अष्टपद की यात्रा की वह अदभुत स्थान था वहाँ बहुत पास से कैलाश पर्वत, नंदी पर्वत व अष्ट पद काफी स्पष्ट दिखाई दिये। रात में होरचु नामक स्थान पर पहुँचकर हमने विश्राम किया। नदी नाला पत्थरों को पार करती हमारी गाड़ी पौन घंटे में दारचीनले आई। यहाँ हमने होटल मानसरोवर में रात बिताई। रात में परिक्रमा की योजना बनाई।

आवश्यक सामग्री, गरम कपड़े आदि रखे और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार घोड़े पिट्टू किराये से लिए। यहाँ से हमें कैलाश के दक्षिणी हिस्से के दर्शन होते हैं यही से ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम हुआ है। वहाँ से बड़े उत्साह से हमारी ढ़ाई दिन की परिक्रमा शुरू हुई। कैलाश पति की कृपा से मौसम साफ व आगे का मार्ग स्पष्ट था।

यात्रा के दौरान एक-एक लकड़ी की छड़ी हर यात्री को दी गई। एक लीटर का आक्सीजन सिलेंडर भी प्रत्येक व्यक्ति के पास था। साथ ही एक सीटी व कपूर की थैली आगे पीछे होने पर व सांस भरने पर उपयोग के लिये दी गई। थी। यदि किसी यात्री को परिक्रमा में सॉस लेने में विशेष कष्ट हो तो उसे पुनः हेलिकॉप्टर द्वारा नेपाल ले जाने की व्यस्था भी थी। पहले व दूसरे दिन 12-12 किमी व तीसरे दिन 18 किमी यात्रा तय करनी थी।
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