काल भैरव मंदिर : आश्चर्य और आस्था का अद्भुत सम्मिश्रण है काल भैरव मंदिर। यहाँ भैरव बाबा की मूर्ति मदिरा पीती है। इसे लेकर कई जाँचें हो चुकी हैं, लेकिन किसी भी तरह से पता नहीं चल सका कि मदिरा आखिर जाती कहाँ है। इस मंदिर का इतिहास भी हजारों साल पुराना है। वाम मार्गी तांत्रिकों का यह प्रमुख मंदिर माना जाता है। यहाँ कई तरह की तंत्र क्रिया भी की जाती हैं। उज्जैन आने वाले लोग महाकाल के बाद सीधे इस मंदिर का रुख करते हैं। मंगलनाथ मंदिर : स्कंधपुराण के अंवतिका खंड में इस मंदिर के जन्म से जुड़ी कथा है। कथा के अनुसार अंधाकासुर नामक दैत्य ने शिव से वरदाना पाया था कि उसकी रक्त की बूँदों से नित नए दैत्य जन्म लेते रहेंगे। इन दैत्यों के अत्याचार से त्रस्त जनता ने शिव की अराधना की। तब शिव शंभु और दैत्य अंधाकासुर के बीच घनघोर युद्ध हुआ।
ताकतवर दैत्य से लड़ते हुए शिवजी के पसीने की बूँदें धरती पर गिरीं, जिससे धरती दो भागों में फट गई और मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई। शिवजी के वारों से घायल दैत्य का सारा लहू इस नए ग्रह में मिल गया, जिससे मंगल ग्रह की भूमि लाल हो गई। दैत्य का विनाश हुआ और शिवजी ने इस नए ग्रह को पृथ्वी से अलग कर ब्रह्माण में फेंक दिया। इस दंतकथा के कारण जिन लोगों की पत्रिका में मंगल भारी होता है, वह उसे शांत करवाने के लिए इस मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। इस मंदिर में मंगल को शिव का ही स्वरूप दिया गया है।
हरसिद्धि मंदिर : यह उज्जैन शक्तिपीठों में भी एक है। महाकाल वन में स्थित हरसिद्धि मंदिर की गणना 51 शक्ति पीठों में की जाती है। यहाँ देवी सती के दाहिने हाथ की कोहनी गिरी थी। यहीं कालिदास की आराध्य महाकाली देवी भी स्थित हैं। महाकाली मंदिर उज्जैन के गढ़ क्षेत्र में स्थित है।
भूखीमाता मंदिर : इस मंदिर से राजा विक्रमादित्य के राजा बनने की दंतकथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि भूखीमाता को रोज एक जवान लड़के की बलि दी जाती थी। जवान लड़के को उज्जैन का राजा घोषित किया जाता था, उसके बाद भूखी माता उसे खा जाती थी। एक बार एक दु:खी माँ का विलाप देख तरुण विक्रमादित्य ने उसे वचन दिया कि उसके बेटे की जगह वह नगर का राजा और भूखी माता का भोग बनेगा। राजा बनते ही विक्रमादित्य ने पूरे शहर को सुगंधित भोजन से सजाने का आदेश दिया। जगह-जगह छप्पन भोज सजा दिए गए। भूखी माता की भूख विक्रमादित्य को अपना आहार बनाने से पहले ही खत्म हो गई और उन्होंने विक्रमादित्य को प्रजापालक चक्रवर्ती सम्राट होने का आशीर्वाद दिया। तब विक्रमादित्य ने उनके सम्मान में इस मंदिर का निर्माण करवाया था। कालिदेह महल : इस महल का निर्माण सिंधिया घराने ने करवाया था। दंतकथा है कि उज्जैन का केवल एक ही महाराजा है, वो है महाकाल। इसके अलावा किसी और राजा को उज्जैन में रात बिताने की अनुमति नहीं है। यदि वह उज्जैन में रात बिता ले तो जल्द ही उसका राज-पाठ नष्ट हो जाएगा। इस दंतकथा के चलते सिंधिया राजाओं ने अपने रुकने के लिए इस महल को बनवाया था। महल के पास सदियों पुराना सूर्य मंदिर है। महल के भग्नावशेष को देखकर लगता है कि शिप्रा के मुहाने बसा यह महल कभी बेहद भव्य रहा होगा।
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