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चलो बुलावा आया है.....
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भागते-भागते एक जगह रूककर माता ने बाबा भैरवनाथ को देखा। इस जगह माँ के पाँव के निशान अब तक बाकी हैं। इस स्थान को चरण-पादुका कहते हैं। आधे रास्ते में माता को एक गुफा दिखाई दी। उस गुफा में प्रवेश कर माँ तपस्या करने लगीं। गुफा के द्वार के ऊपर हनुमान जी माता की रक्षा के लिए बैठ गए। बाबा भैरवनाथ उस गुफा में प्रवेश नहीं कर पाए। नौ माह तक माता ने उस गुफा में रहकर तपस्या की। जैसे माँ के गर्भ में बच्चा नौ माह तक रहता है। इसलिए उस स्थान का नाम गर्भर्जुन या अर्धकुआँरी पड़ा।

माता दूसरे रास्ते से निकलकर कटरा से 12 किलोमीटर ऊपर पहुँचीं। वहाँ बाबा भैरवनाथ के साथ उनका युद्ध हुआ और अंत में एक गुफा के द्वार पर माता ने अपनी तलवार से बाबा भैरवनाथ का सिर काट दिया। बाबा भैरवनाथ का धड़ उस गुफा के द्वार पर ही गिर पड़ा एवं बाबा का सिर हवा में उछलते हुए 1 1/2 किलोमीटर ऊपर एक छोटी-सी गुफा में विराजमान हुआ। वहाँ पर, जहाँ बाबा भैरवनाथ का शीश विराजित हुआ, उसे भैरवनाथ की गुफा कहते हैं और जहाँ पर बाबा भैरवनाथ का वध हुआ, उस गुफा में माता ने अपना वास बनाया। माता आज भी वहाँ पर तीन प्राकृतिक पिण्डियों के रूप में विराजित हैं

प्रथम पिण्डी को माता महालक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। द्वितीय पिण्डी को माँ कालका और तृतीय को माँ सरस्वती का स्वरूप माना गया है। तीनों पिण्डियों को मिलाकर माता वैष्णव देवी का मनोहर स्वरूप बनता है।

मानचित्र में स्थिति - माता वैष्णव देवी का स्थान त्रिकूट पर्वत पर है, इसलिए माता वैष्णव देवी को 'माँ त्रिकुटा भी कहा जाता है। यह पर्वत कटरा नामक गाँव, जो जम्मू जिले में आता है, में स्थित हैजम्मू से कटरा की दूरी 45 किलेमीटर है। नई दिल्ली से जम्मू की दूरी 576 किलोमीटर है। यह दूरी इंदौर से 1539 और मुंबई से 2100 किलोमीटर है।
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