मुख्य पृष्ठ > मनोरंजन > पर्यटन > धार्मिक स्थल
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
चलो बुलावा आया है.....
तरूण हिंगोरानी
WDWD
जय माता दी... जय माता दी... के जयकारे के साथ सिर पर माँ के नाम की चूनर बाँधे, हाथ में सहारे के लिए लकड़ी थामे लोगों के जत्थे-के-जत्थे माँ के दरबार में हाजिरी लगाने को आतुर नजर आते हैं। यह भव्य नजारा है, माँ वैष्‍णो देवी की कठिन चढ़ाई का....

कथा के अनुसार सैकड़ों वर्ष पहले कटरा गाँव में 'श्रीधर' नाम के एक विद्वान पंडित रहा करते थे। एक दिन माता ने उन्हें सपने में आकर कहा कि 'हे ब्राह्मण, तुम मेरे नाम से भंडारा करो और वह भी संपूर्ण गाँव के साथ। उसमें बाल भैरवनाथ एवं उनके शिष्य बाबा गोरखनाथ को भी अवश्य आमंत्रित करना। जब पं. श्रीधर महाराज ने पूरे गाँव को आमंत्रित किया तो पूरे गाँव ने उनका उपहास उड़ाया कि एक निर्धन ब्राह्मण जो खुद दूसरों पर आश्रित है, वह पूरे गाँव को क्या खिलाएगा।

भंडारे वाले दिन पूरे गाँववासी ब्राह्मण के घर पहुँच गए। देवी की कृपा से सुदामा की कुटिया कृष्ण के महल में बदल गई। माँ खुद बालिकाओं के रूप में वहाँ आईं और प्रसादी बनाने लगीं। मेहमानों की आवाभगत में कोई कमी नहीं रही। सभी का भोजन चल ही रहा था कि बाबा भैरवनाथ अपने शिष्यों के साथ पधारे। ब्राह्मण माता का प्रसाद बाबा को देने लगा। भैरवनाथ क्रोधित हुए और कहने लगे कि मुझे माँस और मदिरा चाहिए। ये पूरी-हलवा और चना मैं नहीं खाता हूँ। तब ब्राह्मण ने कहा, यहाँ माँस-मदिरा निषेध है। भैरवनाथ ने गुस्से में पूछा यह प्रसाद किसने बनाया है। ब्राह्मण ने बालिकाओं की तरफ इशारा करते हुए कहा कि यह प्रसाद 'माता' ने बनाया है।

गुस्से में बाबा भैरवनाथ माता को पकड़ने के लिए उनके पीछे-पीछे भागे। भागते-भागते माता पर्वत त्रिकूट पर जाने लगीं। इस समय माँ के साथ हनुमानजी भी थे। हनुमानजी को प्यास लगी तो माता ने अपने धनुष से एक बाण पहाड़ में मारातब वहाँ से एक जल की धारा निकली, जिसे बाणगंगा कहते हैं।
1 | 2 | 3  >>  
और भी
कैसे करें वैष्णोदेवी की चढाई
अमरनाथ यात्रा करते समय ध्यान रखें
प्रकृतिप्रेमियों के आकर्षण का केंद्र : धर्मशाला
स्वर्ण मंदिर का शहर : अमृतसर
रणकपुर का जैन मंदिर