छाया एवं आलेख : गुरमीत बेदी
हिम के अंचल में बसा हिमाचल प्रदेश प्रकृति के सौंदर्य का अनमोल खजाना है। इस प्रदेश को देवभूमि कहलाने का गौरव भी प्राप्त है। यहाँ कई स्थल ऐसे हैं, जो श्रद्धालुओं व प्रकृतिप्रेमियों के लिए समान रूप से आकर्षण का केंद्र हैं। इन स्थलों को हम सौंदर्य व श्रद्धा का संगम भी कह सकते हैं। ऐसा ही एक स्थल है- धर्मशाला, जो कांगड़ा की सुरम्य घाटी में स्थित है।
धर्मशाला को 'पहाड़ों की रानी', 'सौंदर्य की देवी', 'भारत में एक मिनी ल्हासा' जैसे कई नामों से संबोधित किया जाता है। समुद्र तल से करीब तेरह सौ मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह स्थल बर्फीली धौलाधार पहाड़ियों व देवदार के घने जंगलों से घिरा होने के साथ-साथ कई प्राकृतिक सौंदर्य स्थलों को भी अपने आगोश में समेटे है। कहा जाता है कि इस शहर का नामकरण अँगरेजों द्वारा किया गया था। इसके प्राकृतिक सौंदर्य से अँगरेज अधिकारी इतने प्रभावित हुए थे कि उनमें से कई यहीं बस गए थे।
अँगरेजों के समय में शहर काफी विकसित हुआ, लेकिन 1905 में आए भयंकर भूकम्प से सब कुछ तहस-नहस हो गया। इसके बावजूद भूकम्प के जबर्दस्त पंजे यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य में खरोंच तक डालने में नाकाम रहे। यही कारण है कि गत 95 वर्षों से यह निरंतर विकसित होता रहा है। यह नगर जिला कांगड़ा का मुख्यालय है। धर्मशाला में देखने योग्य काफी जगहें हैं। बस, शरीर में दमखम चाहिए- ऊँची-नीची पहाड़ियों में चढ़ने-उतरने का। यूँ तो अधिकांश स्थलों के लिए बसें चलती हैं, लेकिन जो मजा पैदल चलने में है, वह बसों की धक्कमपेल में कहाँ? ठंडी हवा के झोंके जब शरीर को स्पर्श करते हैं तो सारी थकावट छू-मंतर हो जाती है।
वर्षा अधिक होने के कारण इसे 'वर्षा नगर' भी कहा जाता है। धर्मशाला और इसके आसपास जो प्रमुख धार्मिक व पर्यटन स्थल हैं उनमें भागसूनाथ, मेकलॉडगंज, डल झील, करेरी झील, त्रियुंड, शहीद स्मारक, प्राचीन संग्रहालय व चामुंडा प्रमुख हैं। शहीद स्मारक चीड़ के घने व खूबसूरत पेड़ों के बीच करीब सात एकड़ भूमि पर फैला है। इस शहीद स्मारक की काली संगमरमर की दीवारों पर हिमाचल के उन 1042 शहीद सैनिकों के नाम अंकित हैं, जिन्होंने आजादी के बाद 1971 की लड़ाई तक मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। इस स्मारक की बगिया में खिले गुलाबी, लाल व सफेद गुलाब संभवतः जन्म, जीवन और मृत्यु के प्रतीक हैं। इस स्मारक के निकट बहता पिंगल नाला भी स्वयं में कई ऐतिहासिक कथाएँ व किंवदंतियाँ समेटे है।
नगर से करीब दस किलोमीटर दूर प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण डल झील है। देवदार के घने पेड़ों के बीच यह झील अंडाकार है। कहा जाता है कि वर्षों पहले यह काफी बड़े क्षेत्र में फैली थी, लेकिन अब यह निरंतर सिकुड़ रही है। एक किंवदंती के अनुसार इस झील के किनारे कभी भगवान शिव ने घोर तपस्या की थी। झील के निकट दूवेश्वर महादेव का एक मंदिर भी है। जन्माष्टमी के पंद्रह दिन बाद राधाष्टमी को यहाँ भव्य मेला लगता है। डल झील के आगे 'करेरी' नामक एक और झील स्थित है, जो यहाँ के गद्दी समुदाय की आस्था की प्रतीक है।
धर्मशाला से 17 किलोमीटर आगे 'त्रियुंड' है। यह स्थान 2827 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और हैंग ग्लाइडिंग के लिए बहुत उपयुक्त माना जाता है। यहाँ से 11 किलोमीटर दूर भागसूनाथ के चश्मे और शिव मंदिर भी देखने योग्य हैं। गद्दी जनजाति के लोगों में यह धारणा प्रचलित है कि भागसूनाथ चश्मे का जल कैलाश पर्वत की गोद में स्थित मणि महेश झील से आता है। ये लोग अपने मवेशियों का दूध भी सर्वप्रथम भागसूनाथ को ही अर्पित करते हैं। यहीं सामने पहाड़ी पर स्लेटों की खानें हैं। शाम को जब सूर्य की किरणें स्लेटों पर पड़ती हैं तो मनोरम दृश्य उपस्थित होता है।
धर्मशाला में मेकलॉडगंज सबसे ज्यादा उल्लेखनीय है। यहाँ आकर यूँ लगता है मानो हम तिब्बत की राजधानी ल्हासा में पहुँच गए हों। 'ओम मणि पद्मे हुम' मंत्र का जाप करते गेरुआ वस्त्रधारी लामा हमें यत्र-तत्र ध्यान-मग्न दिखाई देते हैं। मेकलॉडगंज मिनी ल्हासा उस समय बना था जब चीन द्वारा तिब्बत हथिया लेने के बाद हजारों तिब्बतियों ने भारत में शरण ली थी। आज यहाँ तिब्बत की निर्वासित सरकार का मुख्यालय भी है और दलाईलामा का निवास भी।
मेकलॉडगंज में ही प्रसिद्ध सेंट जॉन चर्च भी है, जो देवदार के घने पेड़ों के मध्य एकांत में स्थित है। चर्च के प्रांगण में कुछ कब्रें हैं, जिनमें भारत के गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड एलिन द्वितीय की कब्र प्रमुख है। रोम के गिरजाघरों की इस चर्च के भीतर भी रंगीन काँच का उपयोग किया गया है। धर्मशाला से 18 किलोमीटर दूर स्थित चामुंडा मंदिर भारत के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है।
बाणगंगा नदी के एक छोर पर स्थित चारों तरफ से खूबसूरत धौलाधार पहाड़ियों से घिरे इस स्थल में आकर श्रद्धालु अलौकिक शांति महसूस करते हैं। यह मंदिर मुख्य रूप से शिव व दुर्गा का है। मुख्य द्वार में प्रवेश करते ही पहले माँ चामुंडा का मंदिर पड़ता है। सबसे विस्मयकारी बात तो यह है कि मंदिर की परिक्रमा के मुख्य द्वार के निकट कोने में दबी एक विशाल शिला पर माँ चामुंडा के चरण व शिवलिंग के चिह्न आदिकाल से अंकित हैं।
यहाँ से कुछ नीचे उतरकर शिव का एक मंदिर है, जहाँ शिव एक विशाल शिला के नीचे लिंग के रूप में विराजमान हैं। पिछले कुछ वर्षों में यात्रियों की सुविधा के लिए बाणगंगा के तट पर बहुत ही खूबसूरत घाट बनाए गए हैं। साथ ही एक तालाब में शिव व सरस्वती की भव्य मूर्तियाँ स्थापित हैं।
धर्मशाला से बीस किलोमीटर दूर कांगड़ा में स्थित ब्रजेश्वरी मंदिर भी देखने योग्य है। कांगड़ा घाटी का यह सबसे खूबसूरत मंदिर है, जहाँ से हम सम्पूर्ण घाटी का सौंदर्यावलोकन कर सकते हैं। ब्रजेश्वरी मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जब शिव पार्वती के मृत शरीर को अपने कंधों पर उठाकर दौड़ रहे थे तो इस स्थल पर पार्वती का वक्ष गिरा था। इसी कारण ब्रजेश्वरी देवी नामकरण के साथ यहाँ मंदिर बनाया गया।
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