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तीर्थ यात्रा कहीं त्रासदी न बन जाए
- उषा डुग्गर

सदी की पहली वार्षिक अमरनाथ यात्रा में हादसों को जान-बूझकर निमंत्रण दिया जा रहा है। सरकारी अव्यवस्थाओं से लेकर रिकॉर्ड संख्या में शामिल होने वाले लोग इन न्यौतों के लिए जिम्मेदार हैं जो किसी भी समय 1996 की अमरनाथ त्रासदी के रूप में सामने आ सकते हैं।

राज्य प्रशासन सही मायनों में हादसों को निमंत्रण देने के लिए जिम्मेदार है। वह दोषी इसलिए है, क्योंकि वह अमरनाथ यात्रा में शामिल होने वालों को लगातार छूट देता जा रहा है। जहाँ पहले आयु बंधन से छूट दे दी गई, अब वहीं पर यात्रा में भाग लेने वालों की संख्या में छूट दी जा रही है जो हादसों तथा त्रासदी को सबसे बड़ा न्यौता है।

स्थिति यह है कि सरकार की इस छूट के कारण अमरनाथ यात्रा पुनः 1996 के ढर्रे पर पहुँचने लगी है। गौरतलब है कि तब भी किसी प्रकार का बंधन यात्रा में भाग लेने वालों पर नहीं था, जिसका परिणाम 1996 की अमरनाथ त्रासदी के रूप में सामने आया था। तब मौसम की खराबी, बर्फबारी और बदइंतजामी के चलते 300 से अधिक लोग मौत का ग्रास बन गए थे तथा कई अभी भी लापता हैं।

वर्ष 1996 की त्रासदी से कुछ सबक लेने के लिए जम्मू-काश्मीर सरकार ने डॉ. नितिन सेनगुप्त की अध्यक्षता में एक सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति की सिफारिशों में 15 वर्ष से छोटे तथा 65 साल से बड़े व्यक्तियों के यात्रा में भाग लेने पर रोक लगा दी, तो यात्रा में भाग लेने वालों की संख्या 75 हजार भी निर्धारित कर दी। हालाँकि सरकार ने आनन-फानन में इन सिफारिशों को लागू कर दिया।

लेकिन अबकी बार पिछली बार की ही तरह इनका उल्लंघन किया जाने लगा है। सरकार की इच्छा है कि कारगिल संकट के कारण जो पर्यटक काश्मीर नहीं आ पाए वे अमरनाथ यात्रा के बहाने काश्मीर का दौरा अवश्य करें।
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