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भव्य शिल्पकला का पर्याय 'मीनाक्षी मंदिर'
- स्वाति तिवारी

आँख खुलती ही सुमधुर ध्वनि से है। जी हाँ! वहाँ सुबह होती है मंदिर से आने वाली वैदिक मंत्रों, शंखनाद व घंटियों की सुमधुर प्रतिध्वनि के साथ। यह पावन सी सुबह कितना सुकून देती है। मन शांत, ताजा और प्रफुल्लित हो जाता है। हो भी क्यों नहीं? यही तो है हमारी सांस्कृतिक विरासत, जिसे दक्षिण भारत गर्व के साथ सहेजे हुए है। उसी का प्रमाण है कि अब भी विदेशी पर्यटक भारत की कला को न केवल देखने आते हैं, बल्कि उसके आगे नतमस्तक भी हो जाते हैं। दक्षिण भारत प्राकृतिक दृष्टि से जितना सुरम्य है, उसमें वहाँ का प्राचीन शिल्प, वैभव, आस्था और संस्कार चार चाँद लगा देते हैं। दक्षिण का दर्प-शिल्प सौंदर्ययुक्त भव्य मीनाक्षी मंदिर देखने के बाद लगा अब तक हम जिन्हें भव्य कहते आए थे, वे इसके पासंग भी नहीं हैं।

तमिलनाडु के मध्य में स्थित मदुरै नगर की कला एवं संस्कृति की भव्यता राष्ट्र का गौरव कही जा सकती है। धान के विस्तृत खेतों, आकर्षक पाम और नारियल के पेड़ों से सुशोभित, अपने गगनस्पर्शी गोपुरों द्वारा दूर से ही पहचानी जाने वाली मदुरै भारतीय जीवन पद्धति और विचार शैली, संस्कृति परंपरा को अक्षुण्ण रखे हुए है। मीनाक्षी मंदिर को केंद्र में रखकर नगर की रचना कमल के फूल की आकृति में की गई है। दक्षिण भारतीय शिल्पकला का बेहतरीन नमूना माता मीनाक्षीदेवी मंदिर मदुरै की अर्थव्यवस्था का मूल आधार भी है।

भारत के प्राचीन राज्यों में से ऐसा कोई नहीं रहा, जिसका राजवंश मदुरै के पांड्य राजवंश जितनी लंबी अवधि तक लगातार विद्यमान रहा हो। ईसा से चार-पाँच सौ वर्ष पहले से लेकर 14वीं सदी ईस्वी के पूर्वार्द्ध तक पांड्य राजाओं ने मदुरै पर राज किया। अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने मदुरै पर अधिकार किया था और मीनाक्षी मंदिर, सुंदरेश्वरम की बाहरी दीवार एवं बुर्ज तोड़ दिए थे। सौभाग्य से भीतर के मंदिर बच गए थे। बाद में बाहर वाले बड़े गोपुर फिर बनवाए गए।
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