- ज्योति जैन
रास्ता ही मानो ख्वाब था दिल्ली से बागडोगरा की फ्लाइट थी। जैसे ही बागडोगरा के एयरपोर्ट पर उतरे, तैयार खड़ी गाड़ी से शुरू हुआ दार्जीलिंग का सफर। वातावरण में चिपचिपाहट भरी उमस थी। लगा कि यहाँ आने का निर्णय गलत तो नहीं? लेकिन जैसे-तैसे कोर्सियांग नजदीक आने लगा, हरियाले पर्वत व ठंडी हवा अपना असर दिखाने लगे। बागडोगरा से कोर्सियांग होते हुए दार्जीलिंग का सफर करीब साढ़े तीन घंटे का था। दार्जीलिंग के लोकल सीन गंगा मैया, जापानी मंदिर, म्यूजियम वगैरह तो दर्शनीय थे ही, लेकिन वहाँ से करीब दो घंटे की दूरी पर स्थित मिरिक झील तक पहुँचने का रास्ता ही मानो ख्वाब जैसा था।
हल्के हरे गलीचे की तरह बिछे चाय के खेत और गहरे हरे पर्दे की तरह खड़े ऊँचे पाइन ट्री किसी पोस्टर का-सा आभास दे रहे थे। वहाँ के हर घर के बाहर बेशुमार रंग-बिरंगे फूल वहाँ की घनी प्राकृतिक संपदा की कहानी स्वयं बयान कर रहे थे। शायद वहाँ की मिट्टी की ही खासियत थी कि हर झाड़ी पर पत्तों से ज्यादा फूल नजर आते थे। पूरी राह पर बीच-बीच में पेड़ों व पहाड़ों से लिपटे बादल गाड़ी में आकर कपोलों को छू जाते थे। बिलकुल किसी सपने की तरह जो दिखाई तो देते हैं, पर हाथ नहीं आते।
लगा समुद्र में डुबकी लगाई अगले दिन टाइगर हिल पर सूर्योदय का दिलकश नजारा देखने हम 4 बजे ही उठकर पहुँच गए। 5 बजते-बजते सूर्यदेव ने अपना सिन्दूरी मस्तक जरा-सा ऊँचा किया तो इतने उजले लगे मानो समुद्र में डुबकी लगाकर आए हों। ये सारे नजारे कैमरे के साथ आँखों में भी कैद करके बिना किसी थकावट के अगले दो दिन के पड़ाव पेंलिग जा पहुँचे, जहाँ प्रसिद्ध फिल्म कलाकार डैनी डैंगजोप्पा का घर भी था।
करीब 110 किमी की दूरी पर इस पूरे रास्ते साथ-साथ चली पहले रिम्बी नदी, फिर रंगित नदी और पेंलिग पहुँचते-पहुँचते ये दोनों तिस्ता नदी से जा मिलीं। जगह-जगह विशाल झरने ऐसे गिर रहे थे, मानो शीशे के टुकड़े हों। लेकिन फिर भी पेंलिग बिलकुल शांत ठंडी जगह थी, बिलकुल भगवान बुद्ध की तरह।
एक तरफ पर्वत दूजी ओर खाई दो दिन वहाँ ठहरकर करीब 130 किलोमीटर की दूरी साढ़े 4 घंटे में तय करके गंगटोक के लिए रवाना हुए। वह सफर भी प्रकृति की निराली खूबसूरती के साथ-साथ तय हुआ यानी एक बाजू पर्वत तो दूसरी ओर खाई में अल्हड़, चंचल, बेलगाम उछलती लेकिन अपनी हदों में बहती तिस्ता नदी।
गंगटोक में दो दिनी विश्राम था, जहाँ एक दिन तो वहाँ के लोकल नजारे किए विशेषकर आर्किड गार्डन और दूसरे दिन छांगू झील होते हुए नाथूला पास गए। छांगू झील जहाँ पथरीली, बर्फ जमी चट्टानों से आच्छादित थी, वहीं कँपकँपाती ठंड में नाथूला समुद्र सतह से 15,000 फुट की ओर बढ़ते हुए हम प्रकृति के श्वेत धवल रंग में डूबे जा रहे थे।
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