यात्री की डायरी ( रजनी भारतीय)
पहाड़ों के शहर और सिक्किम की राजधानी गंगटोक जाने के लिए हम इंदौर-पटना ट्रेन से पहले पटना पहुँचे। इसके बाद आठ घंटे के सफर के लिए जलपाईगुड़ी के लिए गाड़ी बदलनी होती है।
समुद्र सतह से 5600 फुट की ऊँचाई पर बसे गंगटोक के आसपास तिब्बती मठ, स्तूप, रोप वे, आर्किड फूलों के बाग, नाथुला पास वाला भारत-चीन का सीमा प्रदेश, चावल की खेती, क्षितिज के पार हिमाच्छादित पर्वत श्रेणियाँ जैसी खूबसूरती चारों ओर से दिखाई देती है।
छांगुल लेक - यह स्थान गंगटोक से 38 किमी की दूरी पर है। हिमालय दर्शन के लिए हमारी नजरें बर्फ ढूँढ रही थीं। अचानक गाड़ी ने मोड़ लिया और हम आश्चर्यचकित नजरों से बदलता दृश्य देखते रहे... वह दृश्य अवर्णनीय था। हमारे आसपास तो कपास जैसा भुसभुसा बर्फ फैला पड़ा था और दूर के पहाड़ छितरे बर्फ से ऐसे ढँके थे मानों उन पर सफेद नमक छिड़क दिया गया हो।
पहाड़ी तो एकदम निर्जन थी। पहाड़ों पर न तो पेड़-पौधे न कोई चिड़िया। यदि गलती से कोई पर्यटक दूर निकल जाए तो वह पहाड़ी में ही खो जाए। हाँ, पर अपने हिमालय की रक्षा करने वाले हिमवीर सैनिक थोड़ी-थोड़ी दूरी पर गश्त लगाते दिख जाते हैं। चौबीसों घंटे बर्फ के आगोश में रहना पड़ता है। है ना आश्चर्य की बात? ऐसे ही तो होती है भारत की रक्षा।
अब हम हिमालय का एक छोर नाथुला पास यानी भारत-चीन सीमा रेखा के पास से गुजर रहे थे और आखिर हम हमारे आकर्षण बिंदु पर पहुँच गए। वहाँ था 'छांगुल लेक' इतनी ऊँचाई पर पानी है!
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