पूर्वी भाग चीन सीमा से लगा है। लद्दाख क्षेत्र बौद्ध लामाओं की साधना स्थली है। वर्षभर पर्वतीय शिखर वर्षा से आच्छादित रहते हैं जबकि मैदानी भाग रेगिस्तान है। सुंदरता, रहस्य, धर्म एवं विचित्र शांति का यह क्षेत्र पर्यटकों को मोह लेता है।
लेह प्रसिद्ध भारतीय नदी सिंधु के किनारे है। इंडस या सिंधु नदी ग्रीष्म में इस क्षेत्र के सौंदर्य में चार चाँद लगा देती है। हाल ही में पर्यटन विभाग ने सिंधु दर्शन उत्सव प्रारंभ किया है, जिसका उद्घाटन इस वर्ष 7 जून को प्रधानमंत्री ने किया। सिंधु में आगे निम्मू घाटी में जान्सकार नदी आ मिलती है। इन दो नदियों के मिलन का सौंदर्य शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता।
पर्यटकों के लिए इस क्षेत्र का मुख्य आकर्षण बौद्ध मठ तथा नाम्बियाल नरेशों तथा मठों के महल हैं। लेह से 70 किलोमीटर के अर्द्धव्यास का एक गोला बनाया जाए तो लद्दाख के सभी महत्वपूर्ण मठ व महल इसमें आ जाते हैं। लेह से 126 किलोमीटर दूरी पर लामायुरू नामक स्थल है। यह प्रसिद्ध बौद्ध मठ है। इसका मार्ग सिंधु-जान्सकार के किनारे-किनारे होकर जाता है।
लेह से लामायुरू मार्ग पर प्रसिद्ध व प्राचीन बौद्ध मठ आलची, लिकिर तथा फयांग आता है। ये सभी मठ दर्शनीय हैं। सिंधु का किनारा, पहाड़ों पर बने मठ, शरीर को चुभती ठंडक बहुत रोमांचक लगता है। इसी मार्ग पर प्रसिद्ध निम्मू घाटी तथा मेग्नेटिक हिल है। लेह से निम्मू घाटी मार्ग पर एक प्रसिद्ध गुरुद्वारा है- गुरुद्वारा 'पत्थर साहेब।'
यह गुरुद्वारा गुरु नानकदेवजी के चमत्कारिक व्यक्तित्व से जुड़ा है। सेना इसका संचालन करती है। यहाँ गुरु नानकदेवजी को नानकलामा के नाम से जाना जाता है। लेह-मनाली मार्ग पर एक जगह है कारू। यहाँ सिंधु स्पष्ट रूप से मैदानी भाग में आती है। इसी मार्ग पर शे महल तथा मठ, थिकसे मठ तथा सिंधु के दूसरे किनारे पर हेमिस मठ हैं। ये सभी मठ बहुत ही महत्वपूर्ण तथा लद्दाखी धार्मिक जीवन का आधार हैं। हेमिस व थिकसे मठ में भगवान बुद्ध की सुंदर मूर्तियाँ हैं। महल स्थानीय भवन कला के उत्तम उदाहरण हैं।
लेह के अन्य बौद्ध मठों में जापान द्वारा स्थापित शांति स्तूप, स्टाकना मठ, शंकर मठ, माशो तथा स्टोक मठ व पैलेस भी महत्वपूर्ण हैं। ये सभी लेह के आसपास हैं। स्टोक पैलेस में स्टाकना राजाओं की बहुमूल्य वस्तुओं का संग्रहालय भी है। लेह विमानतल के पास एक प्रसिद्ध मठ है 'स्पितुक मठ'। यह बौद्धों के साथ हिंदुओं व सिखों की आस्था का भी केंद्र है। इस मठ के ऊपरी भाग में भगवती तारा का मंदिर है। मूर्ति वर्षभर कपड़े से ढँकी रहती है। सिर्फ जनवरी में दो दिन आवरण हटता है।
माना जाता है कि तारा की आराधना भगवान बुद्ध करते थे। हिंदुओं के लिए सिद्धपीठ काली का मंदिर है। लद्दाखी जनता के लिए यह देवी पालदन लामो है। लद्दाख के सभी मठ ध्यान, साधना, आध्यात्मिक शक्ति तथा शांति के केंद्र हैं। इन मठों की पूजा व पूजा प्रणाली रहस्यात्मक है। इन मठों की चित्रकारी व मनोहारी रंग पर्यटकों का मन मोह लेते हैं।
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