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हांगकांग और मकाव की सैर
ये हैं चीन के दो अनमोल रतन
- विजय चितल

हांगकांग की सड़क का दृश्य
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हमारी 2005 की सुदूर पूर्व यात्रा में थाईलैंड, मलेशिया और सिंगापुर के स्टैंडर्ड पैकेज के अलावा हांगकांग और मकाव भी शामिल थे जिससे यह यात्रा अनूठी और अधिक रोचक बन गई। कैसे? हमें एक और देश देखने को मिल गया : चीन। सच पूछिए तो यह एक ऊपरी-ऊपरी तसल्ली ही थी, क्योंकि हांगकांग और मकाव पर्यटकों को "असली" चीन का आनंद नहीं देते। क्यों? वही बताने का यह प्रयास है। यह बात अलग है कि पर्यटन क्षेत्र में "असली चीन" न होते हुए भी इन दोनों जगहों की अपनी जबर्दस्त "धौंस" है, महत्व है।

हांगकांग और मकाव मूलतः चीन के ही हिस्से थे। कुछ अहम ऐतिहासिक घटनाएँ हुईं, "ओपियम वॉर" जैसे युद्ध हुए और हांगकांग एक ब्रिटिश उपनिवेश बन गया तथा मकाव गया पुर्तगाल के कब्जे में।

एक सदी से भी ज्यादा समय तक साम्राज्यवादी उपनिवेश बने रहने के बाद अभी-अभी यानी 1997 और 1999 में विशेष संधियों के तहत ब्रिटेन ने हांगकांग को और पुर्तगाल ने मकाव को फिर से चीन के सुपुर्द कर दिया और ये दो "बिछड़े" प्रांत वापस अपनी मातृभूमि यानी मेनलैंड चीन से जा मिले। प्रवास के दौरान जब गाइड इस तरह की जानकारी देता है तो मन ही मन हमारे जैसा भारतीय सैलानी ब्रिटिश इंडिया और गोआ, दमन, दीव को याद करने लगता है।

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चीन ने हांगकांग और मकाव की उसे वापसी के बाद इन दोनों क्षेत्रों के लिए अपने देश के हित में, कुछ विशेष कदम उठाए। इन्हें मुख्य भूमि चीन जैसा साम्यवादी नहीं बनाया बल्कि इन्हें "स्पेशल एडमिनिस्ट्रेटिव रीजन" का दर्जा दिया। इसका आधार बना चीन का "एक देश- दो पद्धतियाँ" सिद्धांत। गाइड ने हमें बताया कि इस सिद्धांत के मायने क्या हैं।

हांगकांग और मकाव दोनों की अपनी अलग-अलग मुद्रा है, न्याय पद्धति है, आव्रजन और वीसा नियम हैं, जो चीन से भिन्न हैं। इन दोनों जगहों के लिए वीसा "ग्रॅटिस" यानी मुफ्त मिलता है और वह भी वहाँ पहुँचने के बाद बड़ी आसानी से। पर्यटकों को और क्या चाहिए? यहाँ इसके अलावा फ्री-ट्रेड है और पूँजीवादी अर्थव्यवस्था है।

हांगकांग में हमारा गाइड चीनी था। अँगरेजी अच्छी बोल लेता था। उसने हमें एबरडीन नामक मछुआरों का गाँव बताया, विक्टोरिया पीक की पहाड़ी से हांगकांग शहर का विहंगम दर्शन कराया। टिपिकल ब्रिटिश बंगले देखकर मुंबई की याद आई। वहाँ से हांगकांग बंदरगाह का नजारा और ऊँची-ऊँची इमारतें मुंबई के मलाबार हिल से नीचे मरीन ड्राइव और "क्वीन्स नेकलेस" के नजारे जैसा ही लगा।

रात्रि का लेसर शो जो बंदरगाह पर होता है, अविस्मरणीय था। उसी प्रकार चकाचौंध कर देने वाली थी नाइट मार्केट। चमकदार नियॉन-साइंस, भीड़ से भरा बाजार और दुकानों में फुटपाथ पर सँकरी गलियों की गुमटियों में असंख्य चीजें, जो चाहे वो खरीदो। लेकिन, हाँ कहीं भी गंदगी नहीं, बहुत व्यवस्थित पार्किंग और ट्रैफिक तथा नियमों के उल्लंघन पर जबर्दस्त दंड!

गाइड ने हमसे पूछा, "आपको "हांगकांग" शब्द का मतलब मालूम है?" किसी को भी मालूम नहीं था। फिर उसी ने जवाब दिया, इसका मतलब है सुगंधित बंदरगाह! और तो और, यह शहर हमारे मशहूर अभिनेता जैकी चैन का शहर है। गाइड के चेहरे पर क्या आनंद झलक रहा था यह सब बताते हुए।

जिस तरह हांगकांग ब्रिटिश और चायनीज झलक दिखा गया, मकाव में दिखा चायनीज और पोर्तुगीज झलक का संगम। वहाँ एक बुजुर्ग पोर्तुगीज शख्स हमारी खिदमत में था। उसने चीनी नागरिकता अब ली थी, परंतु उसकी बातों से उसके दिल में मातृभूमि पुर्तगाल की यादें और एक अजीब दर्द छिपा हुआ था।

मकाव में चीनी एरिया, चीनी मंदिर, चायनीज खाना और भव्य कैसिनो आदि निपटाने के बाद वह हमें पोर्तुगीज मोहल्लों में ले गया। वहाँ हमने सेंटपॉल गिरजाघर देखा। गिरजाघर क्या था, सिर्फ उस पुराने चर्च की सामने वाली मुख्य दीवार अस्तित्व में थी। बाकी सब भग्न धराशायी हो चुका था। फिर भी उसे वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट का दर्जा था और मकाव प्रशासन ने बहुत हिफाजत से उसे रखा हुआ है।

इसी चर्च की भव्य सीढ़ियाँ उतरकर नीचे चौक में एक हृदयस्पर्शी शिल्प था। इसमें एक चीनी युवती एक पोर्तुगीज युवक को गुलाब का फूल उसकी आखिरी बिदाई के वक्त जब पुर्तगाल ने मकाव को फिर से चीन के हवाले कर दिया, दे रही है। गाइड ने भाव-विभोर होकर कहा, हमने मकाव छोड़ा, लेकिन छोड़ते वक्त चीन और पुर्तगाल में कोई कड़वाहट नहीं छोड़ी यह बात इस शिल्प में बयान की गई है।

हम सबने तालियों से उस गाइड का आभार प्रदर्शन किया। सिर्फ एक दिन की भेंट में उसने मकाव के बारे में कितना सारा बताया। और उसका "इमोशनल" हो जाना तो कई "अनकही" बातें कह गया। सच दुनिया में कहीं भी जाओ, मानवीय भावनाएँ एक जैसी होती हैं।

मकाव से हम वापस हांगकांग शाम को आ गए। जलमार्ग का 60 किमी का सफर बड़ा तेज और सुहाना रहा। रात्रि विश्राम के बाद दूसरे दिन थाईलैंड की तरफ बढ़ना था। हांगकांग हवाई अड्डे जाते-जाते मेरे मन में हांगकांग-मकाव यात्रा का फ्लेश बैक चल रहा था। चीन के ये दो अमीर अनमोल रतन थे। यहाँ "ईस्ट मीट्स वेस्ट" थीम जहाँ-तहाँ दिख रही थी चीनी और पाश्चात्य संस्कृति के मिलन में।
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