मुख पृष्ठ > मनोरंजन > पर्यटन > देश-विदेश > हर सफर बन जाएगा यादगार
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजिएयह पेज प्रिंट करें
 
हर सफर बन जाएगा यादगार
यादगार सफर
NDND
सफर करने के बारे में सबसे मजेदार बात है, हर कदम पर किसी नई खोज का रोमांच। फिर चाहे वह किसी बच्चे द्वारा ट्रेन की खिड़की से पहली बार खुले में ऊँटों को चरते देखने का रोमांच हो या फिर पहली-पहली बार किसी अजनबी देश में कदम रखने पर नजर आने वाली एक अलग दुनिया का रोमांच।

यूँ इंसान अपने घर, अपने जाने-पहचाने माहौल के सुरक्षा कवच में सबसे सहज महसूस करता है, लेकिन नएपन की लालसा भी उसका पीछा नहीं छोड़ती। कुछ नया देखने की लालसा ही उसे दुनिया घुमा लाती है।

कभी आदिमानव कुछ नया तलाशने के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल जाता था। आज उसका वंशज महासागर की गहराइयों में गोता लगा चुका है और अंतरिक्ष के निर्वात अंधकार में चहल-कदमी कर चुका है। इन दो विपरीत छोरों के बीच आम मानव रोज कई प्रकार के छोटे-बड़े सफर करता रहता है।

  जरूरी नहीं कि यात्रा कहीं दूर की हो, बोरिया-बिस्तर बाँधकर रेल, बस, जहाज या विमान से की जाए। अपने ही शहर में, कभी उन रास्तों-गलियों से निकलिए, जहाँ से आपका अब तक गुजरना नहीं हुआ है। कुछ नया दिखेगा, कोई नई खोज होगी। सोचने के नए आयाम खुलेंगे।      
कोई कह गया है कि सफर का उद्देश्य मंजिल पर पहुँचना नहीं, बल्कि मंजिल तक पहुँचने की प्रक्रिया का पूरा आनंद लेना होना चाहिए। जब हमारी निगाहें महज मंजिल पर टिकी होती हैं, तब रास्ते अक्सर अनदेखे रह जाते हैं... और कायनात का सारा कोलाहल, संसार का सारा स्पंदन, जिंदगी की तमाम रेलमपेल इन रास्तों पर ही तो बिखरी पड़ी है।

इन्हें नहीं देखा तो सफर महज एक ठिकाना छोड़ दूसरे ठिकाने पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना भर हुआ, जबकि सफर मौका देता है कदम-कदम पर नए झरोखे से नया संसार देखने का, नए मित्र, नए गुरु पाने का, अनसोचे अनुभवों से गुजरकर नई जानकारी, नए ज्ञान के सागर में नहाने का। खैर, सच यह है कि लोग कई कारणों से सफर करते हैं।

कोई घर या दफ्तर के किसी कार्य विशेष के सिलसिले में एक स्थान से दूसरे स्थान जाता है, कोई छुट्टियों में घूमने जाने की औपचारिकता निभाने तो कोई तीर्थ करने। बहुत कम लोग सफर करने के लिए सफर पर निकलते हैं। ऐसे लोगों को न मंजिल पर पहुँचने की जल्दी होती है, न घर लौट आने की चिंता।

एक मंजिल पाते ही ये फिर चल पड़ते हैं किसी और मंजिल की ओर। ये मंजिलें इनके लिए पड़ाव भर होती हैं। इनके लिए मंजिल तो महज बहाना होती है, असल मकसद तो होता है चलना और चलते-चलते संसार से रूबरू होना, अपने ज्ञान का, संवेदनाओं का विस्तार करना, अनुभूतियों और अनुभवों से समृद्ध होना।

आज सूचना तथा परिवहन के भरपूर साधन उपलब्ध हैं लेकिन सदियों पहले जब जिज्ञासु घुमक्कड़ दुनिया देखने निकल पड़ते थे तो उनके पास रोमांच के जज्बे के सिवाय कुछ नहीं होता था। कितने ही यात्री हुए हैं, जिन्होंने खट्टे-मीठे अनुभवों, जानलेवा खतरों और सुखद संयोगों से गुजरते हुए नए, अनजान देशों-सभ्यताओं को जाना-समझा तथा इनकी जानकारी औरों तक भी पहुँचाई। इस विराट, छितरी-छितरी दुनिया को छोटा-सा "ग्लोबल विलेज" बनाने में इन प्राचीन यात्रियों ने ही पहला-पहला योगदान किया था। हाँ, इस दौरान कई तरह के गड़बड़झाले भी हुए।

कोलंबस का ही उदाहरण लीजिए। जनाब निकले थे भारत की खोज करने और जा पहुँचे अमेरिका! यानी "जाते थे जापान, पहुँच गए चीन" का ओरिजिनल उदाहरण! जो भी हो, इस गलती के फलस्वरूप अमेरिकी महाद्वीप से दुनिया रूबरू हुई। ऐसे ही साहसी यात्रियों की बदौलत ऑस्ट्रेलिया की भी खोज हुई थी। ह्यून त्सांग और फाह्यान जैसे चीनी यात्रियों ने कोई डेढ़-पौने दो हजार वर्ष पूर्व भारत की यात्रा कर बौद्ध धर्म ही नहीं, भारतीय संस्कृति तथा रहन-सहन का भी बारीकी से अध्ययन किया।

महीनों, कभी-कभी वर्षों लंबी यात्राएँ करके लौटे यात्रियों ने अपने अनुभव बाँटकर अपने निकटजनों के बीच ज्ञान का प्रसार किया तथा उन्हें भी रोमांच से परिपूर्ण किया। दूर देशों की यात्रा-कथाओं ने सदा हमें मोहा है। सिंदबाद जहाजी के काल्पनिक किस्से कई सदियों से दुनियाभर के बच्चों-बड़ों को लुभाते आए हैं। दूरदराज देशों की यात्राएँ, अजब-गजब लोगों और पशु-पक्षियों से साक्षात्कार, असंभव परिस्थितियों से बच निकलना... सब कुछ है इन किस्सों में। इनके माध्यम से आप और हम घर बैठे विस्मयकारी यात्राओं के साक्षी बने हैं।

जरूरी नहीं कि यात्रा कहीं दूर की हो, बोरिया-बिस्तर बाँधकर रेल, बस, जहाज या विमान से की जाए। अपने ही शहर में, कभी उन रास्तों-गलियों से निकलिए, जहाँ से आपका अब तक गुजरना नहीं हुआ है। कुछ नया दिखेगा, कोई नई खोज होगी। सोचने के नए आयाम खुलेंगे। हाँ, जरूरी नहीं कि जो भी नए अनुभव हों, वे अच्छे ही हों। बुरे भी हो सकते हैं, लेकिन ये भी तो आपके जीवन को और समृद्ध ही करेंगे।

आप यह तय करके घर तो नहीं बैठ सकते कि कोई अच्छा अनुभव हो तो ही बाहर निकलूँ। जीवन के प्रवाह में छलाँग लगाने पर ही पता चलता है कि कब कौन-सा अनुभव अच्छा रहा और कब कौन-सा बुरा। छोटी-मोटी परेशानियाँ सफर का हिस्सा ही होती हैं। जब दुनिया को देखने, जानने निकले हैं तो इसके दोनों रूप देखने में ही तो यात्रा की परिपूर्णता होगी। इसके बिना रोमांच कैसा?
संबंधित जानकारी खोजें
और भी
स्विट्जरलैंड : स्वर्गलोक की सैर
निजामों का शहर - हैदराबाद
बर्फ की होटल में धूजने का मजा
लास वेगास की चकाचौंध अब भारतीयों के लिए
कैसे बिताएँ छुट्टियाँ बच्चों के साथ
ताजमहल का शहर आगरा