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जेलर और तरबूज  Search similar articles
- अशोक चक्रधर

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जेलर ने कालकोठरी का द्वार खोला,
और फाँसी के कैदी से बोला-
ये बताना मेरे आने का प्रयोजन है,
कि आज तेरा अंतिम भोजन है
जो चाहेगा खिलाऊँगा।
अपने पैसे देके मँगवाऊँगा
कुछ भी कर ले चूज !

कैदी बोला- जी, तरबूज !
ओ हो !
क्या नाम लीना है,
तू तो जानता है कि
ये दिसम्बर का महीना है।
तरबूज का तो प्यारे
मौसम ही नहीं है,
अभी बोया भी नहीं गया
क्योंकि धरती नम ही नहीं है।
कैदी बोला खुशी में-
जेलर साहब जिद्दी हूँ पैदाइशी मैं।
यही होगा अच्छा,
कि वचन निभाएँ
और पूरी करें इच्छा !
कोई बात नहीं
मौसम का इंतजार करूँगा,
लेकिन साफ बात है
बिना तरबूज खाए
अब नहीं मरूँगा।

ये बात मैंने आपको इसलिए बताई,
क्योंकि जेलर स्मार्ट था
उसने तरबूज की एक बोरी
कोल्ड स्टोर से मँगवाई।
बोला-
ले बेटा तरबूज खा,
और मरने में
नखरा मत दिखा।
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