एक लेखिका ने किसी पत्रिका के प्रकाशनार्थ अनेक रचनाएँ भेजीं। उसकी सभी रचनाएँ अस्वीकृत हो गईं। अंत में उसने संपादक के नाम प्रेम-पत्र लिखा।
कुछ दिनों के बाद वह पत्र संपादक की टिप्पणी के बाद वापस आ गया।
टिप्पणी थी- मेरे बताए हुए निर्देशों के अनुसार संशोधन करके इसे पुन: भेजो। तभी इस पर विचार संभव हो सकेगा।’
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