निर्माता : अरिंदम चौधरी निर्देशक : रजत कपूर संगीत : सागर देसाई कलाकार : रणवीर शौरी, नेहा धूपिया, नसीरुद्दीन शाह, हर्ष छाया, सौरभ शुक्ला, विनय पाठक, ईरावती हर्षे, ब्रिजेन्द्र काला रेटिंग : 2.5/5
रजत कपूर की ‘मिथ्या’ देखते समय अमिताभ अभिनीत ‘डॉन’ की याद आना स्वाभाविक है क्योंकि कहानी का मुख्य आधार मिलता-जुलता है। लेकिन फिल्म के मध्य बिंदू से लेखक रजत कपूर और सौरभ शुक्ला ने कहानी में जबरदस्त घुमाव लाया है और यही पर ‘मिथ्या’ ‘डॉन’ से जुदा हो जाती है।
रजत कपूर के पास यह कहानी लगभग दस वर्षों से तैयार थी, लेकिन पहले इस पर कोई पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं था। अब ऑफबीट सिनेमा या फार्मूला फिल्मों से हटकर बनाई जाने वाली फिल्में भी पसंद की जाने लगी हैं, इसलिए ‘मिथ्या’ जैसी फिल्में सामने आने लगी हैं। फिल्मों में हीरो बनने आया रणवीर शौरी को यह मालूम नहीं रहता कि उसकी शक्ल ही उसकी दुश्मन बन जाएगी। उसकी शक्ल एक गैंगस्टर से मिलती है। जब इसकी भनक दूसरे गैंग वालों को लगती है तो वे इसका फायदा उठाना चाहते हैं।
वे उस गैंगस्टर की हत्या कर उसकी जगह रणवीर को बैठा देते हैं। एक दुर्घटना घटती है और रणवीर की याददाश्त चली जाती है। यह बात उसके घर वाले छिपाते हैं। डॉन की पत्नी और बच्चों को रणवीर चाहने लगता है। वह मिथ्या को ही सच मानने लगता है।
जब दूसरी गैंग को रणवीर से कोई फायदा नहीं पहुँचता है तो वे उसका राज खोल देते हैं। अंत में जब रणवीर को गोली मार दी जाती है। उस दौरान उसकी याददाश्त वापस आती है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
जब रणवीर की याददाश्त चली जाती है तो फिल्म में अगले पल क्या होने वाला है इसका अंदाज लगाना मुश्किल हो जाता है। इससे फिल्म में रूचि पैदा होती है, लेकिन इस भाग में फिल्म की गति बेहद धीमी हो जाती है।
फिल्म की कहानी मसाला फिल्मों जैसी लगती है, लेकिन प्रस्तुतिकरण प्रयोगात्मक और हट कर है। एक औसत कहानी के उम्दा प्रस्तुतिकरण का श्रेय निर्देशक रजत कपूर को जाता है। फिल्म देखकर महसूस होता है कि यह निर्देशक का माध्यम है और सभी की तुलना में वह फिल्म पर हावी है।
उन्होंने हास्य और रोमांच का संतुलन उम्दा तरीके से बनाए रखा। कहीं भी ऐसा महसूस नहीं होता कि हास्य पैदा करने के लिए कोई दृश्य जबर्दस्ती रखा गया है। लेखन में कुछ कमजोरियाँ हैं, जिसको चतुराईपूर्वक उन्होंने छिपाने की कोशिश की है।
मसलन रणवीर का गैंगस्टर बनकर उसके घर जाना और फिर भी किसी को पता नहीं चलना। उसकी याददाश्त जाने की बात बाहरी व्यक्ति को पता नहीं चलना। उन्होंने हल्के-फुल्के तरीके से पेश कर इन कमियों को ढँक दिया है।
अभिनय की बात की जाएँ तो सभी कलाकारों का काम उम्दा है। रणवीर शौरी ने अपने अभिनय की रेंज दिखाई है। हास्य, डर, प्यार जैसी हर भावना को उन्होंने बखूबी परदे पर पेश किया है। नसीरुद्दीन शाह एक परिपक्व अभिनेता हैं।
नेहा धूपिया ने दिखाया कि अच्छा निर्देशक मिले तो वह अभिनय कर सकती है, हालाँकि उसके पास करने को ज्यादा कुछ नहीं था। सौरभ शुक्ला, विनय पाठक, हर्ष छाया, ईरावती हर्षे और ब्रिजेन्द्र काला ने अपने अभिनय से फिल्म का स्तर ऊँचा उठाया। महमूद का कैमरावर्क फिल्म के मूड के अनुरूप है। बैकग्राउंड म्यूजिक उल्लेखनीय है।
कुल मिलाकर ‘मिथ्या’ उन दर्शकों के लिए हैं, जो आम फिल्मों से हटकर कुछ अलग देखना चाहते हैं।
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