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दस कहानियाँ : चार उम्दा, तीन औसत, तीन बेकार
समय ताम्रकर
लघु फिल्मों को देखने में वैसा ही मजा आता है जैसा क्रिकेट के छोटे स्वरूप 20-20 मैचों को देखकर आता है। भारत में लघु फिल्मों का प्रचलन बिलकुल नहीं है। कई लघु फिल्में वो बात कह जाती है जो तीन घंटे की फिल्में भी नहीं कह पाती। रामगोपाल वर्मा ने छोटी फिल्मों को जोड़कर एक फिल्म में पेश करने का प्रयोग पहले किया था। इस बार संजय गुप्ता ने किया है। ‘दस कहानियाँ’ में उन्होंने दस से बारह मिनट की दस कहानियाँ प्रस्तुत की हैं।
Rice-Plate
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1) राइस प्लेट
निर्देशक : रोहित रॉय
कलाकार : शबाना आजमी, नसीरूद्दीन शाह
’दस कहानियाँ’ की उम्दा कहानियों में से ‘राइस-प्लेट’ एक है। आदमी धर्म-कर्म की बातें तब ही कर सकता है जब उसका पेट भरा हुआ हो। यह संदेश फिल्म में बेहद खूबसूरती के साथ पेश किया गया है। रोहित द्वारा निर्देशित यह फिल्म बाँध कर रखती है। शबाना आजमी कितनी ऊँचे दर्जे की अभिनेत्री हैं, ये बात चंद दृश्यों से पता चल जाती है।

Dino
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2) सेक्स ऑन द बीच
निर्देशक : अपूर्व लाखिया
कलाकार : डिनो मारिया, तरीना
इस लघु फिल्म में कोई नयापन नहीं है और हम इस तरह की कहानी कई बार परदे पर इसे देख चुके हैं। फिल्म को रहस्यमय बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन पहले मिनट से ही इसका अंत पता चल जाता है। डिनो का अभिनय ठीक है, जबकि तरीना ने अभिनय कम, अंग प्रदर्शन ज्यादा किया है।

Lovedale
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3) लवडेल
निर्देशक : जसमीत
कलाकार : नेहा ओबेरॉय, आफताब शिवदासानी, अनुपम खेर, अनुराधा सिंह
जसमीत द्वारा निर्देशित फिल्म में बताया गया है किस तरह भाग्य और संयोग भी जिंदगी में अपनी भूमिका निभाते हैं। कुछ लम्हें आपकी जिंदगी बदल सकते हैं। अनुया की मुलाकात एक ट्रेन में बैठी महिला से होती है और उसकी जिंदगी बदल जाती है। इस कहानी के संवाद बेहद उम्दा हैं। आफताब का चरित्र बड़ा अनोखा है। उसकी कोई ख्वाहिश या महत्वाकांक्षा नहीं है। वह हर लम्हे को अपने मुताबिक नहीं बल्कि लम्हे के मुताबिक अपने आपको ढालता है। आफताब और नेहा का अभिनय उम्दा है।

Matrimony
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4) मेट्रिमोनी
निर्देशक : संजय गुप्ता
कलाकार : मंदिरा बेदी, सुधांशु, अरबाज़ खान
पति के पास समय नहीं है और पत्नी के पास समय ही समय है। दोनों बोरिंग जिंदगी जी रहे हैं। अपनी जिंदगी में रंग भरने के लिए वे आपस में प्यार का नाटक खेलते हैं और एक-दूसरे को धोखा देते हैं। हर दृष्टि से यह फिल्म औसत है।

Gubbare
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5) गुब्बारे
निर्देशक : संजय गुप्ता
कलाकार : नाना पाटेकर, रोहित रॉय, अनिता
‘गुब्बारे’ भावनाओं से भरी हुई हैं। इसकी पटकथा और संवाद गुलजार ने लिखे हैं। पति-पत्नी यदि हिसाब लगाना शुरू करें तो वे पाएँगे कि आधे से ज्यादा समय उन्होंने रूठने-मनाने में ही बरबाद किया है। नाना पाटेकर एक संवाद बोलते हैं ‘जिंदगी उतनी लंबी नहीं है जितनी कि लगती है।‘

प्यार के लिए हमारे पास जो भी थोड़ा-सा वक्त है, उसे भी लड़-झगड़ कर हम गंवा देते हैं। ‘गुब्बारे’ का यह संदेश सीधे दिल को छूता है। यह फिल्म निर्देशक संजय गुप्ता ने अपनी पत्नी को ही ध्यान में रखकर बनाई है, जिनसे उनका अक्सर झगड़ा होता रहता है। नाना पाटेकर का अभिनय देखने लायक है।

Pooranmashi
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6) पूरणमाशी
निर्देशक : मेघना गुलजार
कलाकार : अमृता सिंह, मिनिषा लांबा, परमीत सेठी
वर्षों से अपनी इच्छा को दबाएँ बैठी माँ जब उसे पूरा करती है तो उसका असर उसकी बेटी की जिंदगी पर होता है। स्त्री अपना वजूद माँ, बेटी और पत्नी की भूमिकाओं में खो देती है। फिल्म की कहानी उम्दा है और मेघना गुलजार ने इसे परदे पर प्रभावशाली तरीके से पेश किया है।

Neha
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7) स्ट्रेंजर्स इन द नाइट
निर्देशक : संजय गुप्ता
कलाकार : नेहा धूपिया, महेश माँजरेकर
पति-पत्नी शादी की हर वर्षगाँठ पर एक-दूसरे को अपना एक भेद बताते हैं। पत्नी अपना भेद बताना शुरू करती है और पति अपने विकृत दिमाग से कुछ और कल्पनाएँ करने लगता है, लेकिन वो जो सोचता है वैसा कुछ नहीं रहता है। यह लघु फिल्म कमजोर है और संजय गुप्ता इसे ठीक तरीके से पेश नहीं कर पाएँ। महेश मांजरेकर और नेहा धूपिया पति-पत्नी कम दादा-पोती ज्यादा लगते हैं।

Rise & Fall
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8) राइज एंड फॉल
निर्देशक : संजय गुप्ता
कलाकार : संजय दत्त, सुनील शेट्टी
इस फिल्म से यह संदेश निकलता है कि अपराध कभी खत्म नहीं होता, केवल अपराधी बदलते रहते हैं। कहानी पर तकनीक हावी हो गई है। इस वजह से दस मिनट की फिल्म में भी दर्शक बोर हो जाता है।

Highway
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9) हाई ऑन द हाईवे
निर्देशक : हंसल मेहता
कलाकार : जिमी शेरगिल, मासूमी
यह लघु फिल्म ‘दस कहानियाँ’ की कमजोर कडि़यों में से एक है। बेसिर-पैर कहानी पर बनाई गई इस फिल्म में कुछ भी अच्छा नहीं है। गैर-जिम्मेदार भरी जिंदगी जीने के परिणाम की ओर इंगित करने वाली यह फिल्म गैर-जिम्मेदार तरीके से बनाई गई है।

Zahir
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10) ज़ाहिर
निर्देशक : संजय गुप्ता
कलाकार : दीया मिर्जा, मनोज बाजपेयी
इस फिल्म की कहानी फुटपाथ पर बिकने वाली सस्ती पत्रिकाओं में छपी कहानी जैसी है। अच्छी शुरूआत के बाद यह फिल्म एकदम घटिया स्तर पर आ जाती है। लगता है इसे सिर्फ खानापूर्ति करने के लिए रखा गया है।

रेटिंग : 2.5/5
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