गुजराती भाषा के नाटक ‘महारथी’ के सात सौ से अधिक शो हो चुके हैं। हिन्दी में भी इसका मंचन कुछ बदलाव के साथ किया गया और यह लोकप्रिय हुआ। इस नाटक पर श्री अष्टविनायक ने हिन्दी फिल्म ‘महारथी’ का निर्माण किया। परेश रावल इस फिल्म को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साहित हैं क्योंकि इस नाटक का निर्देशन करने के साथ-साथ 1987 से इसमें वे मुख्य किरदार भी निभाते आ रहे हैं। लेकिन जब इस नाटक पर फिल्म बनी तो उन्होंने निर्देशन करने से मना कर दिया। पेश है परेश से बातचीत :
‘महारथी’ को लेकर आप बेहद उत्साहित हैं, इसकी क्या वजह है? यह मशहूर गुजराती नाटक ‘महारथी’ पर आधारित है, जिसके 700 शो का मंचन सफलतापूर्वक भारत के अलावा अमेरिका, लंदन, दुबई में हो चुका है। हिन्दी में भी इसे पसंद किया गया और इसके तीस शो हुए।
हिन्दी में शो कम क्यों हुए? हिन्दी में हमने राजेन्द्र गुप्ता और सुमुखी पेंडसे जैसे कलाकारों के साथ इसका मंचन किया। बाद में ये कलाकार व्यस्त हो गए, इस वजह से ज्यादा शो नहीं हो पाए।
नाटक को फिल्म के रूप में बदलते समय इसमें क्या बदलाव किए गए? माध्यम की जरूरत और माँग के अनुरूप बदलाव किया गया है, लेकिन इसका पूरा ख्याल रखा गया कि उसकी आत्मा ज्यों कि त्यों रहे। नाटक की पटकथा उत्तम गाड़ा ने लिखी थी और फिल्म की पटकथा भी उन्होंने ही लिखी है। नाटक शब्दों का माध्यम है, जबकि सिनेमा विज़न का। कुछ नए दृश्य जोड़े गए हैं तो कुछ संवाद हटा दिए गए हैं।
‘महारथी’ के कथानक पर रोशनी डालेंगे? यह सुभाष नामक इंसान की कहानी है। सुभाष का किरदार मैंने ही निभाया है। सुभाष फिल्मों में नाम कमाने के लिए मुंबई आता है और एक सफल फिल्म निर्माता (नसीरुद्दीन शाह) के यहाँ ड्रायवर की नौकरी करता है। एक समय ऐसा आता है कि हालात बदल जाते हैं। निर्माता अपनी प्रेमिका (नेहा धूपिया) से शादी करता है जो उसके पैसों के पीछे पागल है। इससे ज्यादा नहीं बताऊँगा क्योंकि यह एक थ्रिलर फिल्म है।
सुना है इसमें कॉमेडी का भी टच है? कॉमेडी है, लेकिन बेवकूफी वाली नहीं।
आपने ‘महारथी’ का निर्देशन क्यों नहीं किया? हमने ‘महारथी’ का पहला शो 1987 में किया था। यह नाटक मेरे दिलो-दिमाग में बसा हुआ है। मैं इससे हटकर नहीं देख सकता था, जबकि सिनेमा के दृष्टिकोण से इसे देखने के लिए एक अलग विजन चाहिए था। इसलिए फिल्म को निर्देशित करने के लिए शिवम नायर को चुना।
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शिवम नायर के बारे में क्या कहेंगे? एक सीधा-सादा और अपना काम चुपचाप करके निकल जाने वाला इंसान। अपने काम में माहिर। शोर-शराबा करने में यकीन नहीं। उन्होंने दक्षिण में कुछ फिल्में निर्देशित की हैं और हिन्दी में भी ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ बनाई थी।
फिल्म में ओम पुरी और नसीर जैसे कलाकार हैं, इन महारथियों के साथ क्या अनुभव रहे? नसीर भाई से काफी कुछ सीखा। ‘महारथी’ के सभी कलाकार दिग्गज हैं, इसलिए किसी में भी असुरक्षा की भावना नहीं थी। सभी चैम्पियन थे इसलिए काम करने का माहौल बहुत बदला हुआ था।