अमिताभ बच्चन हमेशा चर्चाओं का केन्द्र बिंदु रहते हैं। इस समय वे ब्लॉग लिखकर अपने प्रशंसकों से संवाद स्थापित करने में लगे हुए हैं। बिग बी की ‘भूतनाथ’ 9 मई को प्रदर्शित होने जा रही है। जून में बच्चन परिवार ‘सरकार राज’ में नजर आएगा। इसके अलावा वे आइफा अवॉर्ड में भी व्यस्त हैं जो इस वर्ष बैंकॉक में आयोजित होगा।
क्या आपको लगता है कि ‘भूतनाथ’ की कहानी आज के दौर में प्रासंगिक है? ’भूतनाथ’ की कहानी अन्य भूत कथाओं जैसी नहीं है। यह कहानी है एक बच्चे और भूत की, जो दोस्त बन जाते हैं। उनके बीच अनोखा रिश्ता है। वे साथ मिलकर समस्याएँ सुलझाते हैं।
भूत को हम ज्यादातर रामगोपाल वर्मा या रामसे बंधुओं की फिल्म से जोड़ते हैं, लेकिन अमोल पालेकर ने ‘पहेली’ और विवेक शर्मा ने ‘भूतनाथ’ में भूत को नया आयाम दिया है। आप क्या कहना चाहेंगे? आपका कहना सही है। इस समय भारतीय फिल्म उद्योग बदलाव के दौर से गुजर रहा है। प्रयोग करने में फिल्म के असफल होने का जोखिम रहता है, लेकिन सफल होने की आशा भी रहती है। ‘भूतनाथ’ देखने के बाद आप यह नहीं कह पाएँगे कि इसे एक नए निर्देशक ने बनाया है।
पिछले दिनों आपने कई युवा निर्देशकों के साथ काम किया है। इस युवा पीढ़ी में आपको क्या खास नजर आता है? नई पीढ़ी में मुझे उत्साह, आक्रामकता और सफलता को पाने का जूनून नजर आता है। वे नई तकनीक के जानकार हैं, प्रोफेशनल हैं और आगे बढ़ना चाहते हैं। वे स्वतंत्र विचारधारा के हैं और कम उम्र में ही अपने आपको साबित करना चाहते हैं।
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आजकल फिल्म की मार्केटिंग पर बेहद ध्यान दिया जाता है। क्या आपको लगता है कि इससे फिल्म के व्यवसाय पर असर पड़ता है? मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैं सोचता हूँ कि असर होता होगा वरना इतना प्रचार क्यों किया जाता। ‘भूतनाथ’ के जरिए भी हम एक खेल बाजार में ला रहे हैं जिसे खेलकर बच्चों को आनंद आएगा। विदेश में इस तरह की रणनीतियाँ बनाई जाती हैं और वो सफल भी हुई हैं। हमारे यहाँ भी कामयाब होगी।
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