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आशुतोष गोवारीकर से लंबी मुलाकात
अजय ब्रह्मात्म

Aushotosh
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आपका बचपन कहाँ बीता। आप मुंबई के ही हैं या किसी और शहर के...? सिनेमा से आपका पहला परिचय कब हुआ?
- मेरा जन्म मुंबई का ही है। मैं बांद्रा में ही पला-बढ़ा हूँ। जिस घर में मेरा जन्म हुआ है, उसी घर में आज भी रहता हूँ। फिल्मों से मेरा कोई संबंध नहीं था। मैं जब स्कूल में था, तो तमन्ना भी नहीं थी कि फिल्मों में एक्टिंग करूँगा। मेरे पिताजी एक पुलिस ऑफिसर रह चुके हैं। ऐसा भी नहीं था कि उनका कोई फिल्मी संबंध हो। जिस बंगले में मैं रहता था, वह बंगला कुमकुमजी का था। कुमकुमजी ने मदर इंडिया और अन्य कई फिल्मों में काम किया। कुमकुमजी को हम लोग पहचानते थे। उस समय उनके घर पर काफी सारे स्टारों का आना-जाना था। तीसरी कक्षा में मैंने एक नाटक किया था। उसमें मैंने पीछे खड़े एक सिपाही का किरदार किया। मेरा कोई डायलॉग नहीं था। उस नाटक का प्रसारण दूरदर्शन पर हुआ था। लेकिन दिमाग में खयाल नहीं आया कि एक्टिंग करना है या फिल्मों में जाना है। सिर्फ कॉलेज में आने के बाद जब मैं बीएस-सी कर रहा था, तो एक ख्वाहिश जागी कि अब क्या-क्या हो सकता है और क्या कोशिश की जा सकती हैं? कॉलेज में मौके थे। अन्य गतिविधियों में हिस्सा ले सकते थे। लोकनृत्य, समूह गीत, नाटकल विभिन्न भाषाएँ... सब में मैंने अपना नाम दिया। ऐसे ही तुक्का मारा था मैंने और तकदीर ऐसी थी कि सब में मुझे चुन लिया गया। तो वे जो तीन साल थे सीनियर कॉलेज के, उस दौरान हर साल मैं पाँच नाटक, चार फोक डांस, तीन समूह गीत करता रहा। ये सब मैंने किया तब आत्मविश्वास जागा कि एक्टिंग कर सकता हूँ। केतन मेहताजी उन्हीं दिनों आए। उनकी पहली फिल्म आ रही थी 'होली'। वे अलग-अलग कॉलेज में जाकर कास्टिंग कर रहे थे और नए एक्टर खोज रहे थे। मीठीबाई में जब आए तो उन्होंने मेरा परफॉर्मेंस देखा। उन्होंने पूछा कि मैं फिल्म बना रहा हूँ क्या तुम रोल करोगे? मैंने कहा कि नेकी और पूछ-पूछ। सौ प्रतिशत करूँगा। 'होली' करने के बाद मुझे खुद पर विश्वास हुआ कि निश्चित रूप से यह मेरा पेशा हो सकता है। फिर मैंने सोचा कि फिल्मों में एक्टिंग करना है। सच कहूँ तो मैं अचानक संयोग से एक्टर बन गया।

फिल्में तो देखते रहे होंगे आप? आम मध्यमवर्गीय परिवार में फिल्में देखी जाती हैं। आप कितनी फिल्में देख पाते थे यानी हफ्ते या महीने में कितनी बार...?
फिल्म देखने की फ्रीक्वेंसी बहुत अच्छी थी, क्योंकि माता-पिता को बहुत पसंद था फिल्में देखना। हफ्ते में दो फिल्में तो होती ही थीं। वे फैसला करते थे कि कौन सी फिल्म एडल्ट है? कौन सी फिल्म यू है? उस हिसाब से हमें ले जाते थे। पहली फिल्म जो मैंने देखी है, वो 'आराधना' है। तो बाकायदा मेरा भी गुरु शर्ट बना था, डबल बटन वाला, जो राजेश खन्नाजी पहनते हैं। और दूसरी फिल्म जो मैंने लगभग पंद्रह-सोलह बार देखी होगी, वह थी रामानंद सागर साहब की 'आँखें। वह भी कुमकुम आपा के घर में। वहाँ पर 60 एमएम के प्रोजेक्टर से दीवार पर फिल्म देखते थे। अगर आप 'स्वदेश' के 'ये तारा' का फिल्मांकन याद करें तो वही प्रोजेक्टर मेरे दिमाग में था। जो दीवार पर बैठकर देखना या गणपति में गली में बैठकर फिल्म देखना, जिससे दोनों तरफ से आप फिल्म देख सकते हैं। फिल्म देखने का बहुत ही मजबूत प्रभाव रहा है। ऐसा नहीं था कि अनुमति नहीं थी या मौका नहीं था। हम न्यू टॉक‍िज थिएटर या बांद्रा टॉक‍िज थिएटर जाकर देखते थे। उन दिनों भी हम आज की तरह ही फिल्में देखते थे।

क्या फिल्म देखने की पसंद-नापसंद रहती थी। आप चुनते थे कि यह देखनी है और यह नहीं देखनी है?
नहीं, ऐसा कुछ नहीं था। जिस फिल्म की रिपोर्ट अच्छी हो, उसे जरूर देखते थे। कौन सी फिल्म देखनी है, इसका ज्यादातर फैसला माँ-पिताजी ही करते थे।

ठीक है कि वे फैसला लेते थे, लेकिन फैसले का आधार क्या होता था? कि यह फिल्में देखना हैं और यह फिल्म नहीं देखना है?
सर्टिफिकेट बहुत महत्वपूर्ण था। ए या यू। उसके बाद में तो फिल्म की रिपोर्ट देखकर जाते थे कि पड़ोसी ने देख ली है, चलो हम भी देख आते हैं।
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