सुभाष घई की नई फिल्म 'युवराज' बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह लुढ़क गई, लेकिन सुभाष घई इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं । 'युवराज' की जहाँ सभी फिल्म समीक्षकों ने निंदा कर दी थी उसी तरह दर्शकों ने भी फिल्म को नकारा था।
बॉलीवुड में कोई भी निर्माता अपनी फिल्म की असफलता को स्वीकार नहीं करता तो भला शोमैन कहे जाने वाले सुभाष घई कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि उनकी फिल्म असफल हुई है।
फिल्म प्रदर्शित होने के चार दिन बाद मुंबई के कुछ अखबारों में सुभाष घई ने पूरे पन्ने के विज्ञापन छापे जिसमें उन्होंने 'युवराज' को 'सुपरहिट' घोषित कर दिया। इसके लिए कुछ फिल्म समीक्षकों की समीक्षा में से वे चुनिंदा पंक्तियाँ भी उठाई गई हैं जिनमें उन्होंने फिल्म के बारे में जरा भी अच्छा लिखा था।
इस विज्ञापन के बाद मुंबई फिल्म जगत में सुभाष घई की छिछालेदर की जा रही है । कहा जा रहा है कि सुभाष घई को अब संन्यास लेना चाहिए। वह आज भी पुराने जमाने में जी रहे हैं जिसकी वजह से उन्होंने 'युवराज' जैसी फिल्म बनाई है।
इस बारे में सुभाष घई का कहना है कि फिल्म समीक्षकों को फिल्म पसंद आए या न आए, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। मेरी फिल्म के कलेक्शन के आँकड़े दिखा रहे हैं कि फिल्म ने बेहतर व्यवसाय किया है। इसे कहते हैं 'गिरे तो भी टाँग ऊपर।'