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सांवले सलोने आए दिन बहार के...
अजातशत्रु
Hemant Kumar
NDND
लता-हेमंत के युगल गीत महज सिनेमाई नगमे नहीं हैं, वे हमारी आत्मा को पवित्र विचारों से भर देते हैं। एक कचोट उठती है कि सरल-सहज, प्यारे-प्यारे, निर्मल गीतों के वे पुराने दिन अब लौटेंगे या नहीं? क्या फिर से लता जवान हो सकेंगी और फिर से हेमंत दा का वह शालीन, निष्पंक स्वर नए गीतों में सुनाई पड़ सकेगा?

सच यह है कि दुनिया फानी है और बीता हुआ कभी नहीं लौटता। जान-बूझकर मन को छलने की इच्छा होती है। इसका कारण घूम-फिरकर यही है कि गुजरे दौर ने कितने प्यारे नगमे दिए, कैसी हसीन शायरी दी और कैसे लता/ आशा/ रफी/ मन्नाडे/ हेमंत/ मुकेश/ गीता दत्त और तलत जैसे तोहफे आलम को बख्शे।

इन सबने मिलकर रूह को जो ताजगी दी, दिल को जो सुकून अता किया और जमीर को अखलाक (नैतिकता) से जिस कद्र नवाजा, उसे याद करके यह कसक उठती है कि आज हमने कितना खो दिया और कल वक्त बचा-खुचा भी हमसे छीन लेगा! माउथ आर्गन की लीड लिए, प्रवाह के साथ चलने वाला यह सैलानी गीत, लता और हेमंत दा की निष्पाप, स्वच्छ आवाजों के कारण आज भी हमें मोहता है। नजर के सामने बहार के हरे-भरे मंजर खड़े करता है। किसी ग्रामीण भोली-भाली नदी के अहिंसक किनारों को स्मृति में लाता है। इंसानियत, यारी और मेहमाननवाजी के जमानों की याद दिलाती फिर कोई कोयल हमें तसव्वुर में कूकती सुनाई पड़ती है। हम तड़प उठते हैं कि कैसे हम बीते दिनों को जिंदा कर लें और लता दीदी की मीठी, प्यारी आवाज को हमेशा-हमेशा के लिए पांचवें दशक में ठहरा दें।

जानते हैं ऐसा नहीं होगा। पर चलिए अब तड़पने-तरसने का ही मजा ले लें। यह भी तो एक दौलत है। बेरहम वक्त के हाथों नातवान (कमजोर) बनाए गए इंसानों की। एक बात ओर गौर करें लता और हेमंत के युगल गीत हमारे हिन्दी सिनेमा की अमूल्य धरोहर हैं। इनमें आपको अच्छी कविता मिलती है। शांत, निर्मल और कर्णप्रिय संगीत मिलता है।

इन तमाम गीतों को परिवार के साथ बेखटके सुना जा सकता है। इन्हें सुनने के बाद शीतल निर्झर के तले नहाने का एहसास होता है। उल्लेखनीय विशेषता यह है कि स्वयं हेमंत दा व्यक्तिगत जीवन में इतने शालीन, सुसंस्कृत और मर्यादावान व्यक्ति थे कि उनके गीतों में वही सात्विकता आई। आप लता-हेमंत के चंद डूएट्स याद कीजिए। एक ऐसा रास्ता याद आएगा, जहां यहां से वहां तक फूल ही फूल हों और सुबह की शीतल मंदवाही पवन में हिरण-हिरणी का कोई जोड़ा दूब चर रहा हो।
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