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मोहब्बत के धोखे में कोई ना आए...
31 जुलाई : श्रद्धा-सुमन
अजातशत्रु
M Rafi
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सरल, सीधी-सादी धुन। इने-गिने वाद्य। संगीत, मात्र गायन को सहारा देने के लिए और युवा रफी की साफ-स्वच्छ छनी हुई आवाज, जिसमें आप उनके दिल की एक-एक धड़कन और भाव की नरम टहनी की एक-एक लोच पढ़ सकें। गीत सीधे दिल को छू जाता है। न सिर्फ छू जाता है, बल्कि अहसास कराता है कि किसी वास्तविक प्रसंग में किसी वास्तविक भग्नहृदय प्रेमी ने वास्तव में अपना वास्तविक दर्द गाया है। इतना स्वाभाविक है यह रफी नगमा... कि हमारे बीच से सिनेमा को एकदम हटा देता है और हमें हिंदुस्तान के किसी गाँव में ले जाता है।

जहाँ कोई भोलाभाला बैजू या सीधा-सरल गोकलप्रसाद, किसी अमराई के तले, बड़े विरोग से अपना दर्द गा रहा है। ऐसा दर्द, जो उस दुलारी या सरस्वती के कारण है, जो अंततः किसी और के साथ हाथ पीले करके चली गई या माँ-बाप के कहने पर किसी बड़े घराने को पसंद कर लिया, जिस ओर उसका भी कुछ-कुछ रुझान था। सिचुवेशन्स कई हो सकती हैं और आप अपनी स्मृतिगत पृष्ठभूमि के हिसाब से इस गीत में अपने-अपने 'विजुवल्स' देख सकते हैं। मगर सच यह है कि ग्रामीण इनसान-सा यह सीधा-सादा गीत अपनी अपंकिल अनौपचारिकता में हमें बहा ले जाता है और किसी हरी-भरी झाड़ी में अटका देता है। ऐसा शायद इसलिए कि हमारी आत्मा संभवतः आज भी ग्रामीण है और हमें ऋजुता, सचाई और सादगी को पसंद करने के लिए विवश करती है। फिर हमारा अस्तित्व युगों-युगों की अनजान स्मृतियों के सिवा क्या है!

पूरे 59 साल पुराना गीत है यह। इसे रफी साहब ने फिल्म 'बड़ी बहन' (1949) में गाया था। राजेन्द्र कृष्ण ने इसे जैसे बाएँ हाथ से लिखा था और उतनी ही करीबतर व भावप्रधान धुन हुस्नलाल-भगतराम ने बनाई थी। इस गीत पर ग्रामीण सादगी और अवामी सहजता का बड़ा असर है, जैसे तब शहर और मेट्रॉपोलिस थे ही नहीं, जो कुछ था सो कस्बा था। प्राइमरी स्कूल का मास्टर था और मालगुजार की सीधी-सादी, जवान, सुंदर मोड़ी जो अपने से भी छिप-छिपकर 'मास्साब' को प्यार करती थी...। गीत एक गुजरे जमाने की याद दिला देता है।
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