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आम आदमी को नायक बनाने वाले राज कपूर
समय ताम्रकर
Raj Kapoor
चौदह दिसम्बर को राज कपूर का जन्मदिवस है। यदि आज वे जीवित होते तो उनकी उम्र 83 वर्ष होती। शायद इस समय वे रणबीर को लेकर फिल्म बना रहे होते। राज कपूर को इस संसार से बिदा लिए हुए 19 वर्ष से भी ज्यादा हो गए हैं, लेकिन आज भी वे अपनी फिल्मों के माध्यम से जीवित हैं।

शो-मैन कहे जाने वाले राज कपूर की फिल्मों में मनोरंजन के साथ संदेश छिपे रहते हैं। आधी हकीकत आधा फसाना के जरिए बात कहने की उनकी अपनी शैली थी। आम आदमी को नायक बनाकर उसके माध्यम से उन्होंने अपनी बात कही। आज भी उनकी फिल्मों को देश-विदेश में विभिन्न फिल्म समारोहों में देखा जाता हैं। आइए जाने कुछ ऐसी बातें जो राज कपूर के बारे में कम जानी जाती है।

दो भाई और थे
राज कपूर की बहन उर्मिला, भाई शम्मी और शशि के अलावा दो भाई और थे- रवीन्द्र और देवेन्द्र। इन दोनों की अल्पायु में ही मृत्यु हो गई थी। रवीन्द्र ने गलती से चूहों को मारने का जहर खा लिया था, जिससे उसकी मौत हुई। एक सप्ताह के अन्दर ही देवेन्द्र ने भी निमोनिया के कारण दम तोड़ दिया। बाद में शम्मी और शशि का जन्म हुआ। शम्मी को राज कपूर बेहद पसंद करते थे। वे चाहकर भी शम्मी को अपनी फिल्म में नायक के रूप में नहीं ले सकें क्योंकि याहू शम्मी की इमेज उनकी फिल्मों के नायक से ‍मेल नहीं खाती थी। बाद में शम्मी ने ‘प्रेम रोग’ में काम किया।

आर.के. का प्रतीक चिन्ह
आर.के. बैनर के प्रतीक चिन्ह में आदमी के एक हाथ में वायलिन है और एक औरत उसकी बाँहों में झूल रही है। यह प्रतीक चिन्ह राज कपूर की ही फिल्म ‘बरसात’ के एक स्थिर चित्र से लिया गया है। राज जी को यह चित्र बेहद पसंद आया क्योंकि एक हाथ में संगीत और दूसरे हाथ में सौंदर्य। संगीत और सौंदर्य के इस मिश्रण को उन्होंने अपने बैनर के प्रतीक चिन्ह के रूप में चुना।

राज का नायक : आम आदमी
राज कपूर द्वारा बनाई गई फिल्मों में आम आदमी नायक है। फुटपाथ पर रहने वालों, फेरी वालों, चाय बेचने वालों को उनकी फिल्मों में देखा जा सकता है। राज कपूर अक्सर महँगी होटलों के बजाय नुक्कड़ पर स्थित चाय की दुकानों और ढाबों पर जाते थे। वहाँ वे लोगों से बात कर उनके सुख-दु:ख के बारे में जानते थे। राज कपूर को इससे फिल्म बनाने में मदद मिलती थी। उनका कहना था कि मैं आम आदमी के लिए फिल्म बनाता हूँ इसलिए आम लोगों के बीच समय बिताना मुझे पसंद है।

सत्यजीत रॉय से प्रभावित
राज कपूर ‘चोरी-चोरी’ की शूटिंग मद्रास में कर रहे थे। उन्होंने सत्यजीत रॉय द्वारा निर्देशित फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ के बारे में सुना। उस समय मद्रास में फिल्म दिखाई जा रही थी। राज कपूर ने भी फिल्म देखी और दो दिन तक वह फिल्म के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाएँ। बाद में वे सत्यजीत रॉय से मिले और उनसे कहा कि वे आर.के. के लिए हिंदी में एक फिल्म बनाएँ, परंतु सत्यजीत रॉय को हिंदी नहीं आती थी, इसलिए यह संभव नहीं हो सका।

केदार शर्मा का थप्पड़
राज कपूर ने जब फिल्मों में रूचि दिखाई तो उनके पिता पृथ्वीराज कपूर ने उन्हें फिल्म निर्माण की बा‍रीकियाँ सीखने के लिए केदार शर्मा के पास भेजा। पृथ्वीराज चाहते तो ‍वे राज कपूर के लिए फिल्म बना सकते थे, लेकिन वो चाहते थे कि उनका बेटा पहली सीढ़ी से शुरूआत करे। केदार शर्मा की फिल्म में राज कपूर को क्लैपर बॉय का काम मिला।

शॉट शुरु होने के पहले राज कपूर बालों में कंघी घुमाकर क्लैप देने का काम करते थे। केदार शर्मा ने उन्हें कई बार समझाया कि जब उन्हें फिल्म में दिखाया ही नहीं जाएगा तो कंघी करने की और समय बर्बाद करने की क्या जरूरत है। राज कपूर उनकी बात अनसुनी कर देते थे।

एक बार उन्होंने क्लैपर पट्टी को इतना जोर से भिड़ाया कि अभिनेता की नकली दाढ़ी उसमें फँसकर निकल गई। यह देख केदार शर्मा को गुस्सा आया और उन्होंने एक जोरदार थप्पड़ राज के गाल पर जमा दिया। बाद में केदार शर्मा ने राज कपूर को ‘नीलकमल’ में नायक की भूमिका दी। केदार शर्मा ने राज को कहा कि उस दिन तुम्हारी आँखों में जो गहराई और दर्द उभरा था उसने मुझे प्रभावित किया था। उस थप्पड़ से राज कपूर की आगे की राह खुल गई।
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