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Geeta Dutt
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चहक भरी आवाज और गाने के दिलकश अंदाज की मलिका गीता दत्त भारतीय फिल्म संगीत में पश्चिमी छुअन को सुर देने वाली एक ऐसी फनकार थीं जिन्हें हर तरह के गीत गाने में महारत हासिल थी।

भजन गायिका के तौर पर शुरुआत करने वाली गीता दत्त फिल्म ‘बाजी’ के गीतों में अपनी मादक आवाज का जादू जगाकर जल्द ही संगीत जगत पर छा गई और उस जमाने की नई पीढ़ी की पहली पसंद बनकर उभरीं।

हिन्दी फिल्मों में हर तरह के गीत गाने की क्षमता का प्रदर्शन शायद सबसे पहले गीता ने ही किया। चाहे रूमानी गीत हों, तेज संगीत वाले गाने हों, अध्यात्मिक गीत हों या फिर गम भरे नग्मे हों, इस फनकार ने हर गीत को बखूबी गाया और सुनने वालों को मंत्रमुग्ध किया।

गीता ने अपने करियर में करीब 1200 हिन्दी गाने गाए। आवाज में बंगाली खनक उन्हें अपने जमाने की दूसरी गायिकाओं से अलग करती थी। संगीत निर्देशक एस. डी. बर्मन ने उनकी आवाज की इस खासियत का ‘देवदास’ और ‘प्यासा’ में अच्छा इस्तेमाल किया और इन फिल्मों के गाने बहुत पसंद किए गए। ‘प्यासा’ का गीत ‘‘आज सजन मोहे अंग लगा लो’’ बंगाली ‘कीर्तन’ के हिन्दी रूपांतरण का सबसे उपयुक्त उदाहरण है।

गीता दत्त की गायकी काफी हद तक उनकी निजी जिंदगी से प्रभावित थी। ‘बाजी’ फिल्म में गाने के दौरान उनकी मुलाकात उस जमाने के मशहूर निर्देशक गुरुदत्त से हुई। बाद में दोनों शादी के बंधन में बँध गए।

शादी के बाद के शुरुआती वर्षों में गीता ने गुरुदत्त की फिल्मों में बेहतरीन गीत गाए। वर्ष 1947 से 1959 तक का वक्त उनके लिए सुनहरा दौर साबित हुआ। इस दौरान उन्होंने हिन्दी फिल्म संगीत जगत को अनेक लोकप्रिय गीत दिए जिनमें ‘बाबू जी धीरे चलना’, ‘जा जा बेवफा’, ‘हूँ अभी मैं जवाँ’ और ‘ये लो मैं हारी पिया’ जैसे मकबूल नग्मे शामिल हैं।

वर्ष 1964 में गुरुदत्त के निधन के बाद गीता को परेशानियों ने आ घेरा और कुछ वक्त के लिए गायन से उनका नाता लगभग टूट गया। अपने करियर के आखिरी दौर में गीता दत्त ने फिल्म ‘अनुभव’ के गीतों को इतनी खूबसूरती से गाया कि उनके कट्टर आलोचकों को भी उनकी तारीफ करनी पड़ी। साथ ही उन्होंने संगीत की दुनिया को एक बार फिर दिखा दिया कि वे गायन के लिए ही बनी हैं।

मखमली और जीवंत आवाज से श्रोताओं को मुग्ध करने वाली इस कलाकार ने महज 41 साल की उम्र में 20 जुलाई 1972 को इस दुनिया से विदा ले ली।

(भाषा)

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