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क्या हो गया है यशराज फिल्म्स को?
समय ताम्रकर
Aditya
PR
यशराज फिल्म देश के अग्रणी फिल्म निर्माताओं में से एक हैं। उनके बैनर की इतनी प्रतिष्ठा है कि दर्शक यशराज फिल्म्स का नाम देखकर ही टिकट खरीद लेता है, लेकिन इन दिनों यह प्रतिष्ठा तेजी से धूमिल होती जा रही है।

‘टशन’ जैसी फिल्म देखने के बाद कई लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि यह बैनर इतनी खराब फिल्म भी बना सकता है। ‘टशन’ इस बैनर की सबसे कमजोर फिल्म में से एक है।

शायद वे इस भ्रम में रहने लगे हैं कि वे जो बना रहे हैं वो दर्शकों को पसंद आएगा या फिर वे दर्शकों की समझ को कम आँकने की भूल कर रहे हैं।

बी.आर.चोपड़ा से अलग होने के बाद यश चोपड़ा ने इस बैनर को स्थापित किया था। 1976 में प्रदर्शित ‘कभी कभी’ इस बैनर की पहली फिल्म थी। इस बैनर तले यश चोपड़ा खुद भी फिल्म निर्देशित करते रहें और दूसरों से करवाते भी रहें। ऐसा नहीं है कि इस बैनर ने फ्लॉप फिल्में नहीं दी हो। कई फिल्में फ्लॉप हुईं लेकिन व्यावसायिकता इस बैनर पर कभी हावी नहीं हुई।

1995 में यश चोपड़ा के बड़े बेटे आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएँगे’ प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने रेकॉर्ड तोड़ सफलता हासिल की और मुंबई में ये फिल्म पिछले तेरह वर्षों से लगातार चल रही है।

इसके बाद आदित्य ने कमान अपने हाथों में ली। मीडिया से दूर रहने वाले आदित्य ने इस फिल्म के बाद ‘मोहब्बतें’ (2000) बनाई। बाद में वे यशराज फिल्म स्टुडियो बनाने में व्यस्त हो गए और उन पर व्यावसायिकता हावी हो गई। बजाय खुद निर्देशन करने के उन्होंने अपने बैनर तले दूसरों को मौका देना शुरू किया। कम समय में ज्यादा फिल्म और ज्यादा मुनाफा के फेर को समझा जा सकता है।

आदित्य ने एक साथ कई फिल्मों का निर्माण आरंभ कर दिया। हम तुम (2004), धूम (2004), वीर जारा (2004), बंटी और बबली (2005), सलाम नमस्ते (2005), फना (2006), धूम 2 (2006) जैसी फिल्म बनाकर उन्होंने साबित कर दिया कि जनता की नब्ज पर उनकी पकड़ है।

बॉलीवुड के सभी कलाकार यशराज फिल्म्स की फिल्मों में काम करने के लिए लालायित होने लगे। आदित्य फिल्म को फैक्ट्री के प्रोडक्ट की तरह बनाने लगे। एक साल में चार से पाँच फिल्म उनकी आने लगी। इससे फिल्मों की गुणवत्ता पर असर हुआ।

कुछ वर्ष पूर्व रामगोपाल वर्मा ने भी यहीं गलती की थी, जिसका खामियाजा वे अभी तक ‍भुगत रहे हैं। सफलता के शिखर पर बैठकर रामू को यह भ्रम हो गया था कि वे किसी को भी सुपरस्टार बना सकते हैं और किसी भी‍ फिल्म को हिट करवा सकते हैं। उन्होंने थोक फिल्में बनाईं।

पिछले वर्ष यशराज बैनर की पाँच में से चार फिल्में फ्लॉप हो गईं। बॉक्स ऑफिस से परे जाकर भी इन फिल्मों का मूल्यांकन किया जाए तो ये फिल्में गुणवत्ता के लिहाज से कमजोर थीं।

‘टशन’ देखने के बाद लगता है कि आदित्य ने अपनी गलती से कोई सबक नहीं सीखा है। वे खराब माल का अच्छा पैकेजिंग कर अपने नाम को भूना रहे हैं, लेकिन यह सिलसिला ज्यादा लंबा नहीं चलेगा।

आदित्य मनोरंजन की दुनिया के एक उम्दा खिलाड़ी हैं। वे यशराज फिल्म्स को बुरे हालातों से निकालने का माद्दा रखते हैं। टीम की खराब स्थिति को देखते हुए एक कप्तान प्रेरणादायी खेल दिखलाता है। आदित्य भी आठ वर्ष बाद ‘रब ने बना दी जोड़ी’ नामक फिल्म बनाने जा रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि यशराज फिल्म्स के प्रति लोगों में वे फिर विश्वास जगाने में कामयाब होंगे।
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