फिल्म ‘जोधा अकबर’ पर प्रतिबंध लगाना जारी है। हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार ने एक सप्ताह तक फिल्म ‘जोधा अकबर’ चल जाने के बाद प्रतिबंध लगा दिया है। आदेश में कहा गया है कि समाज की शांति भंग होने का अंदेशा था। यह कदम राजपूत समाज की माँग तथा सिनेमाघरों के सामने किए जा रहे है विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए उठाया गया है।
आशुतोष गोवारीकर की फिल्म ‘जोधा अकबर’ अपने निर्माण के समय से तमाम विरोधों का सामना करती रही है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि ‘जोधा अकबर’ के पात्र पहली बार परदे पर दिखाए जा रहे हों। फिल्मिस्तान की फिल्म ‘अनारकली’ और के. आसिफ निर्देशित ‘मुगल-ए-आजम’ में ये किरदार भव्यता के साथ दिखाए गए थे, तब किसी ने कोई विरोध नहीं किया था। और तो और, हाल ही में प्रदर्शित ‘मुगल-ए-आजम’ के रंगीन संस्करण के समय भी कोई कुछ नहीं बोला और न विरोध किया।
दरअसल यह वोट की राजनीति का खेल है। मध्यप्रदेश में 2008 के अंत तक आम चुनाव होने जा रहे हैं। राजपूत समाज के वोट हाथ से फिसल न जाएँ, इसलिए बगैर समीक्षा किए फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया। फिल्म की समीक्षा बाद में की जाएगी, ऐसा अपने निर्णय में दोहराया है।
फिल्मों पर सेंसर बोर्ड से पास होने के बाद इस तरह के प्रतिबंध लगाने की कयावद नई नहीं है। फिल्म ‘ब्लैक फ्रायडे’ और ‘परजानिया’ अपने निर्माण के कुछ वर्ष बाद ही सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो पाईं।
आमिर खान-काजोल अभिनीत फिल्म ‘फना’ को गुजरात में इसलिए प्रदर्शित नहीं होने दिया गया क्योंकि आमिर ने बड़े बाँध तथा विस्थापितों को लेकर जो बयान दिया था उससे कुछ लोग नाराज हो गए थे।
1975 के आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी के खास लोगों ने गुलजार की फिल्म ‘आँधी’ पर इसलिए प्रतिबंध लगवा दिया था कि वह इन्दिरा गाँधी के जीवन से मेल खाती थी। इन्दिराजी के बेटे संजय गाँधी ने अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ को सत्ता विरोधी मानते हुए उसके निगेटिव तक मारुति कारखाने की भट्टी में जला दिए थे।
फिल्म अभिव्यक्ति का एक माध्यम है और भारत के संविधान ने प्रत्येक नागरिक को इसकी स्वतंत्रता का अधिकार दिया है। जब फिल्म सेंसर बोर्ड कानून के अंतर्गत किसी फिल्म को प्रदर्शन की अनुमति देता है, तो फिर किसी भी वर्ग या सम्प्रदाय या प्रदेश सरकार को यह शोभा नहीं देता कि वे इस तरह का कदम उठाएँ।
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