- रिंकी भट्टाचार्या
कई साल पहले पैडर रोड स्थिति कामिनी कौशल के घर पर एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने फिल्म 'बिराज-बहू' के अनुभव मुझे सुनाए थे। उस फिल्म और बिमल रॉय को याद करते हुए वो एकाएक काफी भावुक हो उठी थीं। बिमल रॉय के लिए जो सम्मान और स्नेह मुझे कामिनी कौशल की आँखों में दिखा, उसने मुझे बिमल रॉय के बारे में और जानने को मजबूर किया। कई सालों बाद बिमल रॉय की बेटी रिंकी भट्टाचार्या से बात करते हुए भी 'बिराज-बहू' से जुड़ी यादें ताजा हो आईं। रिंकी ने अपने पिता से जुड़े बहुत से अनुभव बताए। बातें तो बहुत हैं, लेकिन लिखने की सीमाएँ हैं। सो बिमल रॉय की कुछ यादें खुद उनकी बेटी के शब्दों में :
मेरी उम्र नौ साल की थी, जब हमारा परिवार कलकत्ते से मुंबई आया। पिताजी की बचपन की बहुत सारी यादें हैं। वो बहुत अच्छे और नेक इनसान थे। मैं ऐसा इसलिए नहीं कह रही, क्योंकि वो मेरे पिता थे, बल्कि बिमल रॉय के नाम से वाकिफ फिल्म इंडस्ट्री का कोई भी शख्स उनके बारे में आज भी उसी आदर और सम्मान के साथ बात करता है। उनके लिए अपने कहे शब्दों का बड़ा महत्व था। कभी अपनी कही किसी बात से पीछे नहीं हटे और जो वादा किया, उसे जरूर निभाया।
हमारे घर में बहुत सहज वातावरण था। फिल्मी चमक-दमक की छाया भी हमारे घर को छू नहीं पाई थी। हमारे यहाँ कभी फिल्मी पार्टियाँ नहीं होती थीं। मेरे घर में बहुत प्रगतिशील वातावरण था। मैं बहुत खुले विचारों वाले माहौल में पली-बढी़। पिताजी की सोच तनिक भी सामंती या रूढि़यों को मानने वाली नहीं थी। मेरे और मेरे भाई के बीच भी कोई भेदभाव नहीं था। पिता के घर में रहते हुए कभी यह महसूस भी नहीं हुआ कि मैं एक लड़की हूँ या मुझमें और मेरे भाई में कोई फर्क भी हो सकता है। पिताजी हर तरह की बराबरी में यकीन करते थे।
यद्यपि मेरे पिता की रग-रग में फिल्में ही बसी थीं, लेकिन फिल्मों की उनकी परिभाषा बहुत भिन्न थी। वे इसे एक महान कला-माध्यम मानते थे। किताबों-साहित्य में भी उनकी बहुत रुचि थी। उन्होंने बहुत सारी साहित्यिक कृतियों पर भी फिल्में बनाईं। पिताजी की सारी फिल्में मैंने कई-कई बार देखी हैं। कहना मुश्किल है कि पिताजी की फिल्मों में से मेरी पसंदीदा फिल्म कौन-सी है। सभी फिल्में अलग-अलग विषयवस्तु और विचारों का प्रतिनिधित्व करती हैं। सभी अपने दौर की महान फिल्में हैं। मुझे आज भी याद है कि उस जमाने के सारे स्टार कैसे पिताजी के साथ काम करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। वे घर पर चले आते और कहते कि आप तो जो भी भूमिका देंगे, हम आँख मूँदकर करेंगे।
जब मैंने बासु भट्टाचार्या से शादी की तो पिताजी इस शादी से बिलकुल खुश नहीं थे। मैंने अपने परिवार वालों के खिलाफ जाकर यह शादी की थी। एक दामाद के रूप में उन्होंने बासु को कभी पसंद नहीं किया, लेकिन एक दामाद के रूप में उनके सम्मान में भी कोई कमी नहीं की। पिताजी को फेफड़ों का कैंसर था। वे काफी बीमार थे और पूना में एक अस्पताल में थे। उसी समय मेरी बड़ी बेटी पैदा होने वाली थी, प्रेग्नेंसी की बिलकुल आखिरी स्टेज थी। पिता चाहते थे कि मैं कुछ समय उनके पास रहूँ। इसके लिए उन्होंने बाकायदा बासु से अनुमति माँगी, क्योंकि पिता की नापसंदगी के बावजूद वो मेरे पति थे। पिताजी के आखिरी वक्त में मैं पूरे समय उनके साथ रही।
पिताजी हमेशा दूसरों की मदद करते थे, लेकिन इस तरीके से कि किसी को खबर भी न हो। जब वो कलकत्ते में न्यू थिएटर के साथ काम कर रहे थे, तब बी.एन. सरकार ने वहाँ के किसी कर्मचारी की बेटी की शादी के लिए सबको कुछ चंदा देने के लिए कहा। सबने पैसे दे दिए, सिर्फ मेरे पिता को छोड़कर। इस पर बाकी लोग काफी नाराज हुए और बी.एन. सरकार से जाकर शिकायत भी की। इस पर वो हँस पड़े और बोले, 'बिमल तो पहले ही पैसे दे चुका है।'
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तो ऐसा था वह शख्स, लोगों की मदद भी करता तो चुपके से कि कोई जान न पाए। पिताजी बोलते बहुत कम थे। उनकी हिंदी बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए उनकी फिल्मों के सेट पर हमेशा एक डायलॉग डायरेक्टर जरूर होता था। फिल्म इंडस्ट्री में उनका इतना सम्मान था कि सबके सेट पर मौजूद होने के बाद सबसे आखिर में उन्हें बुलाया जाता था। फिल्म के कलाकारों से लेकर टेक्नीशियन और स्पॉट ब्वॉय तक उनकी बहुत इज्जत करते थे।
जब पिताजी 'बिराज बहू' फिल्म बना रहे थे, तो मधुबाला उस फिल्म में नायिका की भूमिका निभाना चाहती थीं। वे तो यहाँ तक तैयार थीं कि इस फिल्म के लिए वे एक रुपए भी पारिश्रमिक नहीं लेंगी, लेकिन पिताजी को लगा कि यह भूमिका कामिनी कौशल ही बखूबी निभा सकती हैं और अंत में वे ही फिल्म की हीरोइन बनीं।
नेहरूजी उन्हें बड़ा पद देना चाहते थे, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। वे तो कलाकार थे। फिल्में बनाना चाहते थे। इस काम में उन्हें खुशी मिलती थी। मैं शायद दुनिया की सबसे सौभाग्यशाली लड़की हूँ जो मुझे बिमल रॉय जैसा पिता मिला।
प्रस्तुति : मनीषा पांडेय
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