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कहाँ हैं तारे जमीं पर?
डॉ. आशीष जैन
Aamir
संदर्भ है, आमिर खान द्वारा निर्देशित और हाल ही में प्रदर्शित एक उत्कृष्ट चित्र - ‘तारे जमीं पर’ का। मुख्य भूमिका में एक बालक है, जो डिस्लेक्सिया नामक बीमारी से ग्रसित है। पूरी कहानी इसी बालक के स्कूल, घर, और समाज में होने वाली कठिनाइयों और उन पर विजय पर केन्द्रित है। इस गम्भीर विषय को आमिर ने बड़ी सहजता से समझाया है। उस पर बालक दर्शील का अद्‍भुत अभिनय।

ख़ैर, यह तो लेख की प्रस्तावना मात्र है। मैं कोई फिल्म की समीक्षा नहीं लिख रहा हूँ। विज्ञान की भाषा में डिस्लेक्सिया यानी लिखे हुए शब्दों और वाक्यों को पढ़ने की असमर्थता। किसी वस्तु की दिशा, गति, और माप का आभास कर पाने की असमर्थता।

क्यों न विज्ञान के इस शब्द ‘डिस्लेक्सिया’ के भावों को हम साहित्य की दृष्टि से विस्तारित कर भाषा को अलंकृत करें। बात अजीब जरूर लगती है, पर कोशिश करते हैं। जो बात लिखी हुई है, सर्वविदित है और जिस पर विवाद का कोई प्रश्न ही नहीं, वह बात इस बीमारी से ग्रसित रोगी पढ़ पाने में असमर्थ हैं।

आती हुई किसी वस्तु की दिशा, गति या माप को वह भाँप नहीं पाते, जो सामान्य लोगों के लिए कोई कठिन काम नहीं है। हालाँकि इन रोगियों को अल्पबुद्धि नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कई क्षेत्रों में ये अपनी विलक्षण बुद्धि के लिए जाने जाते हैं। जैसा स्वयं आमिर ने बताया है, इस बीमारी से ग्रसित कई व्यक्ति आगे चलकर महान अविष्कारक बने और उन्होंने अपनी अलग सोच से दुनिया का नक्शा ही बदल डाला।

अब इसी भाव को ध्यान में रखकर भारतीय सिने उद्योग और हाल ही में प्रदर्शित उनकी कृतियों का स्मरण करें। क्या आपको नही लगता कि एकाध चित्र को छोड दें, तो अधिकांश व्यावसायिक सिनेमा के रचनाकार डिस्लेक्सिक हैं। वे हैं तो विलक्षण बुद्धि के धनी या कई मामलों में सिर्फ धनी, पर दर्शकों की जरूरत, उनकी माँगें और भावनाएँ पढ़ने में विफल।

ऐसा नहीं कि इनको समझने के लिए हार्वर्ड से डिग्री लेने की कोई जरूरत है. पान की दुकान से लेकर कॉलेज और दफ्तर की कैंटीन, बस और ट्रेन में, आपस की बातों में, हर कोई बस एक ही बात तो कह रहा है। आजकल फिल्मों में से रचनाधर्मिता गायब हो गई है, पर फिल्मकार इस बात को पढ़ने में असमर्थ हैं।

हाल ही में वर्ष की बहुचर्चित फिल्म ‘ओम शांति ओम’ प्रदर्शित हुई। चर्चित होने का कारण उसकी कहानी या निर्देशन या पटकथा या संवाद आदि नहीं थे। चर्चा का कारण थे छरहरी दीपिका और नए ‘सिक्स पैक एब्स’ के कलेवर में शाहरुख। न तो दीपिका का इकहरा बदन और न ही शाहरुख के सिक्स पैक एब्स इस फिल्म की स्थूल काया को छुपाने में सक्षम रहें।

कुछ गीत अवश्य सुहाने थे, जिन्हें प्रायोजित टीवी और रेडियो कार्यक्रमों ने खूब बजाया भी और श्रोताओं ने खूब सुना भी। पर फिल्म देखने के बाद ये करेले पर चढ़ी चाशनी या ‘छलावा देकर बुलावा’ से ज्यादा कुछ साबित नहीं हुए।
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